logo

133. सह-अपराधी -- सह-अपराधी, अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध सक्षम साक्षी होगा, और कोई दोषसिद्धि केवल इसलिए अवैध नहीं है कि वह किसी सह-अपराधी के असम्पुष्ट परिसाक्ष्य के आधार पर की गई है।
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="1_1" type="1_1" background_position="left top" border_style="solid" border_position="all" sp
134. साक्षियों की संख्या -- किसी मामले में किसी तथ्य को साबित करने के लिए साक्षियों की कोई विशिष्ट संख्या अपेक्षित नहीं होगी।
135. साक्षियों के पेशकरण और उनकी परीक्षा का क्रम -- साक्षियों के पेशकरण और उनकी परीक्षा का क्रम क्रमशः सिविल और दण्ड प्रक्रिया से तत्समय संबंधित विधि और पद्धति द्वारा, तथा ऐसी किसी विधि के अभाव में न्यायालय के विवेक द्वारा, विनियमित होगा।
22. दस्तावेजों की अन्तर्वस्तुं के बारे में मौखिक स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं -- किसी दस्तावेज की अन्तर्वस्तु के बारे में मौखिक स्वीकृतियां तब तक सुसंगत नहीं होती, यदि और जब तक उन्हें साबित करने की प्रस्थापना करने वाला पक्षकार यह दर्शित न कर दे कि ऐसी दस्तावेज की अंतर्वस्तुओं का द्वितीयक साक्ष्य देने का वह एतस्मिन् पश्चात दिए हुए नियमों के अधीन हकदार है, अथवा जब तक पेश की गई दस्तावेज का असली होना प्रश्नगत न हो।
136. न्यायाधीश साक्ष्य की ग्राह्यता के बारे में निश्चय करेगा -- जबकि दोनों में से कोई पक्षकार किसी तथ्य का साक्ष्य देने की प्रस्थापना करता है, तब न्यायाधीश साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाले पक्षकार से पूछ सकेगा कि अभिकथित तथ्य, यदि वह साबित हो जाए, किसी प्रकार सुसंगत होगा, और यदि न्यायाधीश यह समझता है कि वह तथ्य यदि साबित हो गया तो सुसंगत होगा, तो वह उस साक्ष्य को ग्रहण करेगा, अन्यथा नहीं।
137. मुख्य परीक्षा-- किसी साक्षी की उस पक्षकार द्वारा, जो उसे बुलाता है, परीक्षा उसकी मुख्य परीक्षा कहलाएगी। प्रतिपरीक्षा -- किसी साक्षी की प्रतिपक्षी द्वारा की गई परीक्षा उसकी प्रतिपरीक्षा कहलाएगी। पुनःपरीक्षा -- किसी साक्षी की प्रतिपरीक्षा के पश्चात् उसकी उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसे बुलाया था, परीक्षा उसकी पुनःपरीक्षा कहलाएगी।
138. परीक्षाओं का क्रम -- साक्षियों से प्रथमतः मुख्य परीक्षा होगी, तत्पश्चात् (यदि प्रतिपक्षी ऐसा चाहे तो) प्रतिपरीक्षा होगी, तत्पश्चात् (यदि उसे बुलाने वाला पक्षकार ऐसा चाहे तो) पुनःपरीक्षा होगी। परीक्षा और प्रतिपरीक्षा को सुसंगत तथ्यों से संबंधित होना होगा, किन्तु प्रतिपरीक्षा का उन तथ्यों तक सीमित रहना आवश्यक नहीं है, जिनकी साक्षी ने अपनी मुख्य परीक्षा में परिसाक्ष्य दिया है। पुनःपरीक्षा की दिशा -- पुनःपरीक्षा उन बातों के स्पष्टीकरण के प्रति उद्दिष्ट होगी जो प्रतिपरीक्षा में निर्दिष्ट ह
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="3_5" type="3_5" background_position="left top" border_style="solid" border_position="all" sp
139. किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए समनित व्यक्ति की प्रतिपरीक्षा -- किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए समनित व्यक्ति केवल इस तथ्य के कारण कि वह उसे पेश करता है साक्षी नहीं हो जाता तथा यदि और जब तक वह साक्षी के तौर पर बुलाया नहीं जाता, उसकी प्रतिपरीक्षा नहीं की जा सकती।
140. शील का साक्ष्य देने वाले साक्षी -- शील का साक्ष्य देने वाले साक्षियों की प्रतिपरीक्षा और पुनःपरीक्षा की जा सकेगी।
141. सूचक प्रश्न -- कोई प्रश्न, जो उस उत्तर को सुझाता है जिसे पूछने वाला व्यक्ति पाना चाहता है या पाने की आशा करता है, सूचक प्रश्न कहा जाता है।
142. उन्हें कब नहीं पूछना चाहिए -- सूचक प्रश्न मुख्य परीक्षा में या पुनःपरीक्षा में, यदि विरोधी पक्षकार द्वारा आक्षेप किया जाता है, न्यायालय की अनुज्ञा के बिना नहीं पूछे जाने चाहिए। न्यायालय उन बातों के बारे में, जो पुनः स्थापना के रूप में या निर्विवाद हैं या जो उसकी राय में पहले से ही पर्याप्त रूप से साबित हो चुके हैं, सूचक प्रश्नों के लिए अनुज्ञा देगा।
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" hundred_percent_height="no" hundred_percent_height_scroll="no" align_content="stretch" flex_align_items="flex-start" flex_justify_content="flex-start" hundred_percent_height_center_content="yes" equal_height_columns="no" container_tag="div" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" status="published" border_style="solid" box_shadow="no" box_shadow_blur="0" box_shadow_spread="0" gradient_start_position="0" gradi
143. उन्हें कब पूछा जा सकेगा -- सूचक प्रश्न प्रतिपरीक्षा में पूछे जा सकेंगे।
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="1_4" align_self="auto" content_layout="column" align_content="flex-start" valign_content="fl
144. लेखबद्ध विषयों के बारे में साक्ष्य -- किसी साक्षी से, जबकि वह परीक्षाधीन है, यह पूछा जा सकेगा कि क्या कोई संविदा, अनुदान या संपत्ति का अन्य व्ययन, जिसके बारे में वह साक्ष्य दे रहा है, किसी दस्तावेज में अन्तर्विष्ट नहीं था, और यदि वह कहता है कि वह था, या यदि वह किसी ऐसी दस्तावेज की अन्तर्वस्तु के बारे में कोई कथन करने ही वाला है, जिसे न्यायालय की राय में, पेश किया जाना चाहिए, तो प्रतिपक्षी आक्षेप कर सकेगा कि ऐसा साक्ष्य तब तक नहीं दिया जाए जब तक ऐसी दस्तावेज पेश नहीं कर दी जाती, या जब तक वे
145. पूर्वतन लेखबद्ध कथनों के बारे में प्रतिपरीक्षा -- किसी साक्षी की उन पूर्वतन कथनों के बारे में, जो उसने लिखित रूप में किए हैं या जो लेखबद्ध किए गए हैं और जो प्रश्नगत बातों से सुसंगत हैं, ऐसा लेख उसे दिखाए बिना, या ऐसे लेख साबित हुए बिना, प्रतिपरीक्षा की जा सकेगी, किन्तु यदि उस लेख द्वारा उसका खण्डन करने का आशय है तो उस लेख को साबित किए जा सकने के पूर्व उसका ध्यान उस लेख के उन भागों की ओर आकर्षित करना होगा जिनका उपयोग उसका खण्डन करने के प्रयोजन से किया जाना है।
संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ -- (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 है |
146. प्रतिपरीक्षा में विधिपूर्ण प्रश्न -- जबकि किसी साक्षी से प्रतिपरीक्षा की जाती है, तब उससे एतस्मिनपूर्व निर्दिष्ट प्रश्नों के अतिरिक्त ऐसे कोई भी प्रश्न पूछे जा सकेंगे, जिनकी प्रवृत्ति-- (1) उसकी सत्यवादिता परखने की है, (2) यह पता चलाने की है वह कौन है और जीवन में उसकी स्थिति क्या है, अथवा (3) उसके शील को दोष लगाकर उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुंचाने की है, चाहे ऐसे प्रश्नों का उत्तर उसे प्रत्यक्षतः या परोक्षत: अपराध में फंसाने की प्रवृत्ति रखता हो, या उसे किसी शास्ति
147. साक्षी को उत्तर देने के लिए कब विवश किया जाए -- यदि ऐसा कोई प्रश्न उस वाद या कार्यवाही से सुसंगत किसी बात से संबंधित है, तो धारा 132 के उपबंध उसको लागू होगे।
148. न्यायालय विनिश्चित करेगा कि कब प्रश्न पूछा जाएगा और साक्षी को उत्तर देने के लिए कब विवश किया जाएगा -- यदि ऐसा कोई प्रश्न ऐसी बात से संबंधित है, जो उस बात या कार्यवाही से वहां तक के सिवाय जहां तक कि वह साक्षी के शील को दोष लगाकर उसकी विश्वसनीयता पर प्रभाव डालती है, सुसंगत नहीं है, तो न्यायालय विनिश्चित करेगा कि साक्षी को उत्तर देने के लिए विवश किया जाए या नहीं और यदि वह ठीक समझे, तो साक्षी को सचेत कर सकेगा कि वह उसका उत्तर देने के लिए आबद्ध नहीं है। अपने विवेक का प्रयोग करने में न्यायालय निम
149. युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न न पूछा जाएगा -- कोई भी ऐसा प्रश्न, जैसा कि धारा 148 में निर्दिष्ट है, नहीं पूछा जाना चाहिए, जब तक कि पूछने वाले व्यक्ति के पास यह सोचने के लिए युक्तियुक्त आधार न हो कि वह लांछन, जिसका उससे प्रवहण होता है, सुधारित है। दृष्टांत (क) किसी बैरिस्टर को किसी अटर्नी या वकील द्वारा अनुदेश दिया गया है कि एक महत्वपूर्ण साक्षी डकैत है। उस साक्षी से यह पूछने के लिए कि क्या वह डकैत है, यह युक्तियुक्त आधार है। (ख) किसी वकील को न्यायालय में किसी व्यक्ति द्वारा जानकारी
150. युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न पूछे जाने की अवस्था में न्यायालय की प्रक्रिया -- यदि न्यायालय की यह राय हो कि ऐसा कोई प्रश्न युक्तियुक्त आधारों के बिना पूछा गया था, तो यदि वह किसी बैरिस्टर, प्लीडर, वकील या अटर्नी द्वारा पूछा गया था, तो वह मामले की परिस्थितियों की उच्च न्यायालय को या अन्य प्राधिकारी को, जिसके ऐसा बैरिस्टर, प्लीडर, वकील या अटर्नी अपनी वृत्ति के प्रयोग में अधीन है, रिपोर्ट कर सकेगा।
151. अशिष्ट और कलंकात्मक प्रश्न -- न्यायालय किन्हीं प्रश्नों का या पूछताछों का, जिन्हें वह अशिष्ट या कलंकात्मक समझता है, चाहे ऐसे प्रश्न या जांच न्यायालय के समक्ष प्रश्नों को कुछ प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखते हों, निषेध कर सकेगा, जब तक कि वे विवाद्यक तथ्यों के या उन विषयों के संबंध में न हो, जिनका ज्ञात होना यह अवधारित करने के लिए आवश्यक है कि विवाद्यक तथ्य विद्यमान थे या नहीं।
152. अपमानित या क्षुब्ध करने के लिए आशयित प्रश्न -- न्यायालय ऐसे प्रश्न का निषेध करेगा, जो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपमानित या क्षुब्ध करने के लिए आशयित है, या जो यद्यपि स्वयं में उचित है, तथापि रूप में न्यायालय को ऐसा प्रतीत होता है कि वह अनावश्यक तौर पर संतापकारी है।
153. सत्यवादिता परखने के प्रश्नों के उत्तरों का खण्डन करने के लिए साक्ष्य का अपवर्जन -- जबकि किसी साक्षी से ऐसा कोई प्रश्न पूछा गया हो, जो जांच से केवल वहीं तक सुसंगत है जहां तक कि वह उसके शील को क्षति पहुंचाकर उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुंचाने की प्रवृत्ति रखता है, और उसने उसका उत्तर दे दिया हो, तब उसका खण्डन करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं दिया जाएगा; किन्तु यदि वह मिथ्या उत्तर देता है, तो तत्पश्चात् उस पर मिथ्या साक्ष्य देने का आरोप लगाया जा सकेगा। अपवाद 1 -- यदि किसी साक्षी
154. पक्षकार द्वारा अपने ही साक्षी से प्रश्न -- (1) न्यायालय उस व्यक्ति को, जो साक्षी को बुलाता है, उस साक्षी से कोई ऐसे प्रश्न करने की अपने विवेकानुसार अनुज्ञा दे सकेगा, जो प्रतिपक्षी द्वारा प्रतिपरीक्षा में किए जा सकते हैं। (2) इस धारा की कोई बात, उपधारा (1) के अधीन इस प्रकार अनुज्ञात किए गए व्यक्ति को ऐसे साक्षी के साक्ष्य के किसी भाग का अवलम्ब लेने के हक से वंचित नहीं करेगी।
155. साक्षी की विश्वसनीयता पर अधिक्षेप -- किसी साक्षी की विश्वसनीयता पर प्रतिपक्षी द्वारा, या न्यायालय की सम्मति से उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसे बुलाया है, निम्नलिखित प्रकारों से अधिक्षेप किया जा सकेगा :- (1) उन व्यक्तियों के साक्ष्य द्वारा, जो यह परिसाक्ष्य देते हैं कि साक्षी के बारे में अपने ज्ञान के आधार पर, वे उसे विश्वसनीयता का अपात्र समझते हैं, (2) यह साबित किए जाने द्वारा कि साक्षी को रिश्वत दी गई है या उसने रिश्वत की प्रस्थापना प्रतिगृहीत कर ली है या उसे अपना साक्ष्
156. सुसंगत तथ्य के साक्ष्य की सम्पुष्टि करने की प्रवृत्ति रखने वाले प्रश्न ग्राह्य होंगे -- जबकि कोई साक्षी, जिसकी संपुष्टि करना आशयित हो, किसी सुसंगत तथ्य का साक्ष्य देता है, तब उससे ऐसी अन्य किन्हीं भी परिस्थितियों के बारे में प्रश्न किया जा सकेगा, जिन्हें उसने उस समय या स्थान पर, या के निकट सम्प्रेक्षित किया, जिस पर ऐसा सुसंगत तथ्य घटित हुआ, यदि न्यायालय की यह राय हो कि ऐसी परिस्थितियाँ, यदि वे साबित हो जाएं साक्षी के उस सुसंगत तथ्य के बारे में, जिसका वह साक्ष्य देता है, परिसाक्ष्य को सम्पुष
157. उस तथ्य के बारे में पश्चात्वर्ती अभिसाक्ष्य की सम्पुष्टि करने के लिए साक्षी के पूर्वतन कथन साबित किए जा सकेंगे -- किसी साक्षी के परिसाक्ष्य की सम्पुष्टि करने के लिए ऐसे साक्षी द्वारा उसी तथ्य से संबंधित, उस समय पर या के लगभग जब वह तथ्य घटित हुआ था, किया हुआ, या उस तथ्य का अन्वेषण करने के लिए विधि द्वारा सक्षम किसी प्राधिकारी के समक्ष किया हुआ कोई पूर्वतन कथन साबित किया जा सकेगा।
158. साबित कथन के बारे में, जो कथन धारा 32 या 33 के अधीन सुसंगत है, कौन-सी बातें साबित की जा सकेंगी -- जब कभी कोई कथन, जो धारा 32 या 33 के अधीन सुसंगत है, साबित कर दिया जाए, तब चाहे उसके खण्डन के लिए या सम्पुष्टि के लिए या जिसके द्वारा वह किया गया था उस व्यक्ति की विश्वसनीयता को अधिक्षिप्त या पुष्ट करने के लिए वे सभी बातें साबित की जा सकेंगी, जो यदि वह व्यक्ति साक्षी के रूप में बुलाया गया हो और उसने प्रतिपरीक्षा में सुझाई हुई बात की सत्यता का प्रत्याख्यान किया होता, तो साबित की जा सकती।
159. स्मृति ताजी करना -- कोई साक्षी जबकि वह परीक्षा के अधीन है, किसी ऐसे लेख को देख करके, जो कि स्वयं उसने उस संव्यवहार के समय जिसके संबंध में उससे प्रश्न किया जा रहा है, या इतने शीघ्र पश्चात् बनाया हो कि न्यायालय इसे संभाव्य समझता हो कि वह संव्यवहार उस समय उसकी स्मृति में ताजा था, अपनी स्मृति को ताजा कर सकेगा। साक्षी उपर्युक्त प्रकार के किसी ऐसे लेख को भी देख सकेगा जो किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तैयार किया गया हो और उस साक्षी द्वारा उपर्युक्त समय के भीतर पढ़ा गया हो, यदि वह उस लेख का, उस समय जब
160. धारा 159 में वर्णित दस्तावेज में कथित तथ्यों के लिए परिसाक्ष्य -- कोई साक्षी किसी ऐसी दस्तावेज में, जैसी धारा 159 में वर्णित है, वर्णित तथ्यों का भी, चाहे उसे स्वयं उन तथ्यों का विनिर्दिष्ट स्मरण नहीं हो, परिसाक्ष्य दे सकेगा, यदि उसे यकीन है कि वे तथ्य उस दस्तावेज में ठीक-ठीक अभिलिखित थे। दृष्टांत कोई लेखाकार कारबार के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी जाने वाली बहियों में उसके द्वारा अभिलिखित तथ्यों का परिसाक्ष्य दे सकेगा, यदि वह जानता हो कि बहियाँ ठीक-ठीक रखी गई थीं, यद्यपि वह प्रविष्ट किए
161. स्मृति ताजी करने के लिए प्रयुक्त लेख के बारे में प्रतिपक्षी का अधिकार -- पूर्ववर्ती अन्तिम दो धाराओं के उपबंधों के अधीन देखा गया कोई लेख पेश करना और प्रतिपक्षी को दिखाना होगा, यदि वह उसकी अपेक्षा करे। ऐसा पक्षकार, यदि वह चाहे, उस साक्षी से उसके बारे में प्रतिपरीक्षा कर सकेगा।
162. दस्तावेजों का पेश किया जाना -- किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए समनित साक्षी, यदि वह उसके कब्जे में और शक्यधीन हो, ऐसे किसी आक्षेप के होने पर भी, जो उसे पेश करने या उसकी ग्राह्यता के बारे में हो, उसे न्यायालय में लाएगा। ऐसे किसी आक्षेप की विधिमान्यता न्यायालय द्वारा विनिश्चित की जाएगी। न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, उस दस्तावेज का, यदि वह राज्य की बातों से संबंधित न हो, निरीक्षण कर सकेगा, या अपने को उसकी ग्राह्यता अवधारित करने के योग्य बनाने के लिए अन्य साक्ष्य ले सकेगा। दस्तावेजों का अनु
163. मंगाई गई और सूचना पर पेश की गई दस्तावेज का साक्ष्य के रूप में दिया जाना -- जबकि कोई पक्षकार किसी दस्तावेज को, जिसे पेश करने की उसने दूसरे पक्षकार को सूचना दी है, मंगाता है और ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है और उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसके पेश करने की मांग की थी, निरीक्षित हो जाती है, तब यदि उसे पेश करने वाला पक्षकार उससे ऐसा करने की अपेक्षा करता है, तो वह उसे साक्ष्य के रूप में देने के लिए आबद्ध होगा।
164. सूचना पाने पर जिस दस्तावेज के पेश करने से इंकार कर दिया गया है, उसको साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाना -- जबकि कोई पक्षकार ऐसी किसी दस्तावेज को पेश करने से इंकार कर देता है, जिसे पेश करने की उसे सूचना मिल चुकी है; तब वह तत्पश्चात् उस दस्तावेज को दूसरे पक्षकार की सम्मति के या न्यायालय के आदेश के बिना साक्ष्य के रूप में उपयोग में नहीं ला सकेगा। दृष्टांत ख पर किसी करार के आधार पर क वाद लाता है और वह ख को उसे पेश करने की सूचना देता है। विचारण में क उस दस्तावेज की मांग करता है और ख उसे पेश करन
Part II Classification 4. Classification of Civil Services. - The Civil Services of the State shall be classified as follows;- (i) Group-A (ii) Group-B (iii) Group-C (iv) Group-D 5. Constitution of Civil Services. - The Civil Services of the State shall be constituted into Group-A, Group-B, Group-C and Group-D by a general or special order of the Government. 6. Classification of posts. - All the civil posts under the State shall, by a general or special order of the Government, be clas
165. प्रश्न करने या पेश करने का आदेश देने की न्यायाधीश की शक्ति -- न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता चलाने के लिए या उनका उचित सबूत अभिप्राप्त करने के लिए, किसी भी रूप में किसी भी समय किसी भी साक्षी या पक्षकारों से किसी भी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न, जो वह चाहे, पूछ सकेगा, तथा किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा; और न तो पक्षकार और न उनके अभिकर्ता हकदार होंगे कि वे किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई भी आक्षेप करें, न ऐसे किसी भी प्रश्न के प्रत्युत्तर में द
Part III Appointing Authority 7. Appointment in Group A and Group B of Civil Services. - All appointments to Group-A and Group-B of Civil Services and Group-A posts shall be made by the Government: Provided that the Government may, by a general or a special order and subject to such conditions as may be specified in such order, delegate the power to make such appointments to any other authority. 8. Appointments to other Services and Posts. - All appointments to Group-B, Group-C and Group
166. जूरी या असेसरों की प्रश्न करने की शक्ति -- जूरी द्वारा या असेसरों की सहायता से विचारित मामलों में जूरी या असेसर साक्षियों से कोई भी ऐसे प्रश्न न्यायाधीश के माध्यम से या इजाजत से कर सकेंगे, जिन्हें न्यायाधीश स्वयं कर सकता हो, और जिन्हें वह उचित समझे।
Part IV Suspension 9. Order of Suspension. - (1) The appointing authority or any authority to which the appointing authority is subordinate or the disciplinary authority or any other authority empowered in that behalf by the Government by general or special order, may place a government servant under suspension when- (a) a disciplinary proceeding against the Government Servant is contemplated or is pending, or (b) in the opinion of the authority aforesaid, the government servant has engaged
167. साक्ष्य के अनुचित ग्रहण या अग्रहण के लिए नवीन विचारण नहीं होगा -- साक्ष्य का अनुचित ग्रहण या अग्रहण स्वयंमेव किसी भी मामले में नवीन विचारण के लिए या किसी विनिश्चय के उलटे जाने के लिए आधार नहीं होगा, यदि उस न्यायालय को जिसके समक्ष ऐसा आक्षेप उठाया गया है, यह प्रतीत हो कि आक्षिप्त और गृहीत उस साक्ष्य के बिना भी विनिश्चय के न्यायोचित ठहराने के लिए यथेष्ट साक्ष्य था अथवा यह कि यदि अगृहीत साक्ष्य लिया भी गया होता, तो उससे विनिश्चय में फेरफार न होना चाहिए था। अनुसूची -- [अधिनियमितियाँ निरसित] 
Part-V Penalties and Disciplinary Authorities 14. Minor and Major Penalties. - The following penalties may, for good and sufficient reasons and as hereinafter provided, be imposed on a Government servant, namely:- Minor Penalties:- (i) censure; (ii) withholding of promotion; (iii) recovery from his pay of the whole or part of any pecuniary loss caused by him to the Government by negligence or breach of orders; (iv) reduction to a lower stage in the time-scale of pay for a period not exc
प्रारम्भिक
Part-VI Procedure for Imposing Penalties 17. Procedure for imposing major penalties. - (1) No order imposing any of the penalties specified in clauses [(vi) to (xi)] of Rule 14 shall be made without holding an inquiry, as far as may be, in the manner provided in these Rules. (2) Wherever the disciplinary authority is of the opinion that there are grounds for inquiring about the truth of any imputation of misconduct or misbehaviour against a government servant, he may himself inquire into it
Part-VII Appeals 23. Orders against which appeal lies. - A Government Servant may prefer an appeal against order of suspension or order of punishment. 24. Appellate Authorities. - (1) A Government Servant, including a person who has ceased to be in government service, may prefer an appeal against the orders specified in Rule 23 to the authority specified in this behalf by a general or special order of the Government or, where no such authority is specified:- (i) where such Government Serva
Part-VIII Revision 28. Revision - (1) Notwithstanding anything contained in these Rules,- (i) the Government, or (ii) the head of a department directly under the Government, in the case of a Government servant serving in a department or office, under the control of such head of a department, or (iii) the appellate authority, or (iv) any other authority specified in this behalf by the Government by a general or special order, and within such time as may be prescribed in such general or spec
Part-IX Miscellaneous 29. Power to relax time limit and to condone delay. - Save as otherwise expressly provided in these Rules, the authority competent under these Rules to make any order may, for good and sufficient reasons or if sufficient cause is shown, extend the time specified in these Rules for anything required to be done under these Rules or may condone any delay. 30. Overriding effect of these Rules. - Notwithstanding contained any thing contrary to these Rules in any other Rules
(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो. (1) In this Act, unless the context otherwise requires,―
Government of Bihar, PARD, Notification No. 3/M-1-16/2001-Ka-1112, dated-12.7.2005. - In exercise of the powers conferred by the proviso to the Article 309 of the Constitution of India, the Government of Bihar is pleased to make the following Rules-   Part-1 General 1. Short title, extent and commencement. - (1) These Rules may be called the "Bihar Government Servants (Classification, Control and Appeal) Rules, 2005". (2) It shall extend to the whole of the State of Bihar. (3) T
Government of Bihar, PARD, Notification No. 3/M-1-16/2001-Ka-1112, dated-12.7.2005. - In exercise of the powers conferred by the proviso to the Article 309 of the Constitution of India, the Government of Bihar is pleased to make the following Rules-   Part-I General 1. Short title, extent and commencement. - (1) These Rules may be called the "Bihar Government Servants (Classification, Control and Appeal) Rules, 2005". (2) It shall extend to the whole of the State of Bihar. (3) T
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="1_1" type="1_1" background_position="left top" border_style="solid" border_position="all" sp
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="1_1" type="1_1" layout="1_1" background_position="left top" border_style="solid" border_posi
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="1_1" type="1_1" background_position="left top" border_style="solid" border_position="all" sp
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="1_1" layout="1_1" background_position="left top" border_style="solid" border_position="all"
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ -- यह अधिनियम भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 कहा जा सकेगा। इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है [The words "except the State of Jammu and Kashmir" omitted by Act 34 of 2019, s. 95 and the Fifth Schedule (w.e.f. 31-10- 2019)] और यह किसी न्यायालय में या के समक्ष की जिसके अन्तर्गत आर्मी ऐक्ट, (44 तथा 45 विक्टो, अ. 58), नेवल डिसिप्लिन ऐक्ट (29 तथा 30 तथा विक्टो, म. 109) या इंडियन नेवी (डिसिप्लिन) ऐक्ट, 1934 (1934 का 34) या एयर फोर्स ऐक्ट (7 जा. 5, अ. 51) के अधीन संयो
2. [अधिनियमितियों का निरसन] निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित।
3. निर्वचन खण्ड -- इस अधिनियम में निम्नलिखित शब्दों और पदों का निम्नलिखित भावों में प्रयोग किया गया है, जब तक कि संदर्भ से तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो— "न्यायालय" -- "न्यायालय” शब्द के अन्तर्गत सभी न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट तथा मध्यस्थों के सिवाय साक्ष्य लेने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत सभी व्यक्ति आते हैं। "तथ्य" -- “तथ्य” से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आती हैं-- (1) ऐसी कोई वस्तु, वस्तुओं की अवस्था, या वस्तुओं का संबंध जो इंद्रियों द्वारा बोधगम्य हो; (2) कोई मानसिक द
4. “उपधारणा कर सकेगा" -- जहां कहीं इस अधिनियम द्वारा यह उपबंधित है कि न्यायालय किसी तथ्य की उपधारणा कर सकेगा, वहां न्यायालय या तो ऐसे तथ्य को साबित हुआ मान सकेगा, यदि और जब तक वह नासाबित नहीं किया जाता है, या उसके सबूत की मांग कर सकेगा : “उपधारणा करेगा" -- जहां कहीं इस अधिनियम द्वारा यह निर्दिष्ट है कि न्यायालय किसी तथ्य की उपधारणा करेगा, वहां न्यायालय ऐसे तथ्य को साबित मानेगा यदि और जब तक वह नासाबित नहीं किया जाता है। ''निश्चायक सबूत" -- जहां कि इस अधिनियम द्वारा एक तथ्य किसी अन्य तथ्य का
5. विवाद्यक तथ्यों और सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा -- किसी वाद या कार्यवाही में हर विवाद्यक तथ्य के और ऐसे अन्य तथ्यों के, जिन्हें एतस्मिन्-पश्चात् सुसंगत घोषित किया गया है, अस्तित्व या अनस्तित्व का साक्ष्य दिया जा सकेगा और किन्हीं अन्यों का नहीं। स्पष्टीकरण -- यह धारा किसी व्यक्ति को ऐसे तथ्य का साक्ष्य देने के लिए योग्य नहीं बनाएगी, जिससे सिविल प्रक्रिया से संबंधित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबंध द्वारा वह साबित करने से निर्हकित कर दिया गया है। दृष्टांत (क) ख की मृत्युका
6. एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति -- जो तथ्य विवाद्य न होते हुए भी किसी विवाद्यक तथ्य से उस प्रकार संसक्त है कि वे एक ही संव्यवहार के भाग हैं, वे तथ्य सुसंगत हैं, चाहे वे उसी समय और स्थान पर या विभिन्न समयों और स्थानों पर घटित हुए हों। दृष्टांत (क) ख को पीटकर उसकी हत्या करने का क अभियुक्त है। क या ख या पास खड़े लोगों द्वारा जो कुछ भी पिटाई के समय या उससे इतने अल्पकाल पूर्व या पश्चात् कहा या किया गया था कि वह उसी संव्यवहार का भाग बन गया है, वह सुसंगत तथ्य है। (ख) क एक सशस
7. वे तथ्य जो विवाद्यक तथ्यों के प्रसंग, हेतुक या परिणाम हैं -- वे तथ्य सुसंगत हैं, जो सुसंगत तथ्यों के या विवाद्यक तथ्यों के अव्यवहित या अन्यथा प्रसंग, हेतुक या परिणाम हैं, या जो उस वस्तुस्थिति को गठित करते हैं, जिसके अन्तर्गत वे घटित हुए या जिसने उनके घटने या संव्यवहार का अवसर दिया। दृष्टांत (क) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख को लूटा। ये तथ्य सुसंगत है कि लूट के थोड़ी देर पहले ख अपने कब्जे में धन लेकर किसी मेले में गया और उसने दूसरे व्यक्तियों को उसे दिखाया या उनसे इस तथ्य का कि उसके पास धन
8. हेतु, तैयारी और पूर्व का या पश्चात् का आचरण -- कोई भी तथ्य, जो किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य का हेतु या तैयारी दर्शित या गठित करता है, सुसंगत है। किसी वाद या कार्यवाही के किसी पक्षकार या किसी पक्षकार के अभिकर्ता का ऐसे वाद या कार्यवाही के बारे में या उसमें विवाद्यक तथ्य या उससे सुसंगत किसी तथ्य के बारे में आचरण और किसी ऐसे व्यक्ति का आचरण, जिसके विरुद्ध कोई अपराध किसी कार्यवाही का विषय है, सुसंगत है, यदि ऐसा आचरण किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य को प्रभावित करता है या
9. सुसंगत तथ्यों के स्पष्टीकरण या पुनःस्थापनआवश्यक तथ्य  के लिए -- वे तथ्य, जो विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य के स्पष्टीकरण या पुनःस्थापन के लिए आवश्यक हैं अथवा जो किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य द्वारा इंगित अनुमान का समर्थन या खण्डन करते हैं, अथवा जो किसी व्यक्ति या वस्तु का, जिसकी अनन्यता सुसंगत हो, अनन्यता स्थापित करते हैं, अथवा वह समय या स्थान स्थिर करते हैं, जब या जहां कोई विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य घटित हुआ अथवा जो उन पक्षकारों का संबंध दर्शित करते हैं, जिनके द्वारा ऐसे किसी तथ्य
10. सामान्य परिकल्पना के बारे में षड़यंत्रकारी द्वारा कही या की गई बातें -- जहां कि यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि दो या अधिक व्यक्तियों ने अपराध या अनुयोज्य दोष करने के लिए मिलकर षड़यंत्र किया है, वहां उनके सामान्य आशय के बारे में उनमें से किसी एक व्यक्ति द्वारा उस समय के पश्चात् जब ऐसा आशय उनमें से किसी एक ने प्रथम बार मन में धारण किया, कही गई या लिखी गई कोई बात उन व्यक्तियों में से हर एक व्यक्ति के विरुद्ध, जिनके बारे में विश्वास किया जाता है, कि उन्होंने इस प्रकार षड़यंत्र किया है
11. वे तथ्य जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं कब सुसंगत हैं -- वे तथ्य, जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं, सुसंगत हैं— (1) यदि वे किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य से असंगत हैं, (2) यदि वे स्वयंमेव या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य का अस्तित्व या अनस्तित्व अत्यंत अधिसम्भाव्य या अनधिसम्भाव्य बनाते हैं। दृष्टांत (क) प्रश्न यह है कि क्या क ने किसी अमुक दिन कलकत्ते में अपराध किया। यह तथ्य कि वह उस दिन लाहौर में था, सुसंगत है। यह तथ्य कि जब अपराध किया गया था उस समय के लगभग
12. नुकसानी के लिए वादों में रकम अवधारित करने के लिए न्यायालय को समर्थ करने की प्रवृत्ति रखने वाले तथ्य सुसंगत हैं -- उन वादों में, जिनमें नुकसानी का दावा किया गया है, कोई भी तथ्य सुसंगत है जिससे न्यायालय नुकसानी की वह रकम अवधारित करने के लिए समर्थ हो जाए, जो अधिनिर्णीत की जानी चाहिए।
13. जबकि अधिकार या रूढ़ि प्रश्नगत है तब सुसंगत तथ्य -- जहां कि किसी अधिकार या रूढ़ि के अस्तित्व के बारे में प्रश्न है, निम्नलिखित तथ्य सुसंगत हैं— (क) कोई संव्यवहार, जिसके द्वारा प्रश्नगत अधिकार या रूढ़ि सृष्ट, दावाकृत, उपांतरित, मान्यकृत, प्राख्यात या प्रत्याख्यात की गई थी या जो उसके अस्तित्व से असंगत था, (ख) वे विशिष्ट उदाहरण, जिनमें वह अधिकार या रूढ़ि दावाकृत, मान्यकृत या प्रयुक्त की गई थी या जिनमें उसका प्रयोग विवादग्रस्त था या प्राख्यात किया गया था या उसका अनुसरण नहीं किया गया था। दृ
14. मन या शरीर की दशा या शारीरिक संवेदना का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य -- मन की कोई भी दशा जैसे आशय, ज्ञान, सद्भाव, उपेक्षा, उतावलापन, किसी विशिष्ट व्यक्ति के प्रति वैमनस्य या सदिच्छा दर्शित करने वाले अथवा शरीर की या शारीरिक संवेदना की किसी दशा का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य तब सुसंगत हैं, जबकि ऐसी मन की या शरीर की या शारीरिक संवेदना की किसी ऐसी दशा का अस्तित्व विवाद्य या सुसंगत है। स्पष्टीकरण 1 -- जो तथ्य इस नाते सुसंगत है कि वह मन की सुसंगत दशा के अस्तित्व को दर्शित क
15. कार्य आकस्मिक या साशय था इस प्रश्न पर प्रकाश डालने वाले तथ्य -- जबकि प्रश्न यह है कि कार्य आकस्मिक या साशय था या किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय से किया गया था, तब यह तथ्य कि ऐसा कार्य समरूप घटनाओं की आवली का भाग था जिनमें से हर एक घटना के साथ वह कार्य करने वाला व्यक्ति सम्पृक्त था, सुसंगत है। दृष्टांत (क) क पर यह अभियोग है कि अपने गृह के बीमे का धन अभिप्राप्त करने के लिए उसने उसे जला दिया। ये तथ्य कि क कई गृहों में एक के पश्चात् दूसरे में रहा जिनमें से हर एक का उसने बीमा कराय
16. कारबार के अनुक्रम का अस्तित्व कब सुसंगत है -- जबकि प्रश्न यह है कि क्या कोई विशिष्ट कार्य किया गया था, तब कारबार के ऐसे किसी भी अनुक्रम का अस्तित्व, जिसके अनुसार वह कार्य स्वभावतः किया जाता, सुसंगत तथ्य है। दृष्टांत (क) प्रश्न यह है कि क्या एक विशिष्ट पत्र प्रेषित किया गया था। ये तथ्य कि कारबार का यह साधारण अनुक्रम था कि वे सभी पत्र, जो किसी खास स्थान में रख दिए जाते थे, डाक में डाले जाने के लिए ले जाए जाते थे और कि वह पत्र उस स्थान में रख दिया गया था, सुसंगत है। (ख) प्रश्न यह है कि
17. स्वीकृति की परिभाषा -- स्वीकृति वह मौखिक या दस्तावेजी अथवा इलेक्ट्रानिक रूप में अन्तर्विष्ट कथन है, जो किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य के बारे में कोई अनुमान इंगित करता है और जो ऐसे व्यक्तियों में से किसी के द्वारा ऐसी परिस्थितियों में किया गया है जो एतस्मिन् पश्चात् वर्णित हैं।
18. स्वीकृति -- कार्यवाही के पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा -- वे कथन स्वीकृतियाँ हैं, जिन्हें कार्यवाही के किसी पक्षकार ने किया हो, या ऐसे किसी पक्षकार के ऐसे किसी अभिकर्ता ने किया हो जिसे मामले की परिस्थितियों में न्यायालय उन कथनों को करने के लिए उस पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से प्राधिकृत किया हुआ मानता है। प्रतिनिधिक रूप से वादकर्ता द्वारा -- वाद के ऐसे पक्षकारों द्वारा, जो प्रतिनिधिक हैसियत में वाद ला रहे हों या जिन पर प्रतिनिधिक हैसियत में वाद लाया जा रहा हो, किए गए कथन, ज
19. उन व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियाँ जिनकी स्थिति वाद के पक्षकारों के विरुद्ध साबित की जानी चाहिए -- वे कथन, जो उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिनकी वाद के किसी पक्षकार के विरुद्ध स्थिति या दायित्व साबित करना आवश्यक है, स्वीकृतियाँ हैं, यदि ऐसे कथन ऐसे व्यक्तियों द्वारा, या उन पर लाए गए वाद में ऐसी स्थिति या दायित्व के संबंध में ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध सुसंगत होते और यदि वे उस समय किए गए हों जबकि उन्हें करने वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति ग्रहण किए हुए है या ऐसे दायित्व के अधीन है। दृष्टांत ख के ल
20. वाद के पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियाँ -- वे कथन, जो उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिनको वाद के किसी पक्षकार ने किसी विवादग्रस्त विषय के बारे में जानकारी के लिए अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट किया है, स्वीकृतियाँ हैं। दृष्टांत यह है कि क्या क द्वारा ख को बेचा हुआ घोड़ा अच्छा है। ख से क कहता है कि “जाकर ग से पूछ लो, ग इस बारे में सबकुछ जानता है"। ग का कथन स्वीकृति है।
21. स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध और उनके द्वारा या उनकी ओर से साबित किया जाना -- स्वीकृतियाँ उन्हें करने वाले व्यक्ति के या उसके हित प्रतिनिधि के विरुद्ध सुसंगत हैं और साबित की जा सकेंगी, किन्तु उन्हें करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से या उसके हित प्रतिनिधि द्वारा निम्नलिखित अवस्थाओं में के सिवाय उन्हें साबित नहीं किया जा सकेगा :- (1) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब साबित की जा सकेगी, जबकि वह इस प्रकृति की है कि यदि उसे
[fusion_builder_container type="flex" hundred_percent="no" equal_height_columns="no" hide_on_mobile="small-visibility,medium-visibility,large-visibility" background_position="center center" background_repeat="no-repeat" fade="no" background_parallax="none" parallax_speed="0.3" video_aspect_ratio="16:9" video_loop="yes" video_mute="yes" border_style="solid"][fusion_builder_row][fusion_builder_column type="3_4" type="3_4" layout="3_4" background_position="left top" border_style="solid" border_posi
22-क. इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु के बारे में मौखिक स्वीकृतियाँ कब सुसंगत होती हैं -- किसी इलेक्ट्रानिक अभिलेख की अन्तर्वस्तु के बारे में मौखिक स्वीकृतियाँ तब तक सुसंगत नहीं होती जब तक पेश किए गए इलेक्ट्रानिक अभिलेख का असली होना प्रश्नगत न हो.
23. सिविल मामलों में स्वीकृतियाँ कब सुसंगत होती हैं -- सिविल मामलों में कोई भी स्वीकृति सुसंगत नहीं है, यदि वह या तो इस अभिव्यक्त शर्त पर की गई हो कि उसका साक्ष्य नहीं दिया जाएगा या ऐसी परिस्थितियों के अधीन दी गई हो जिनसे न्यायालय यह अनुमान कर सके कि पक्षकार इस बात पर परस्पर सहमत हो गए थे कि उसका साक्ष्य नहीं दिया जाना चाहिए। स्पष्टीकरण -- इस धारा की कोई भी बात किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील को किसी ऐसी बात का साक्ष्य देने से छूट देने वाली नहीं मानी जाएगी जिसका साक्ष्य देने के लिए धारा
24. उत्प्रेरणा, धमकी या वचन द्वारा कराई गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में कब विसंगत होती है -- अभियुक्त व्यक्ति द्वारा की गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में विसंगत होती है, यदि उसके किए जाने के बारे में न्यायालय को प्रतीत होता हो कि अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध आरोप के बारे में वह ऐसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन द्वारा कराई गई है जो प्राधिकारवान् व्यक्ति की ओर से दिया गया है और जो न्यायालय की राय में इसके लिए पर्याप्त हो कि वह अभियुक्त व्यक्ति को यह अनुमान करने के लिए उसे युक्तियुक्त प्रतीत होने व
25. पुलिस ऑफिसर से की गई संस्वीकृति का साबित न किया जाना -- किसी पुलिस ऑफिसर से की गई कोई भी संस्वीकृति किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध साबित न की जाएगी।
26. पुलिस की अभिरक्षा में होते हुए अभियुक्त द्वारा की गई संस्वीकृति का उसके विरुद्ध साबित न किया जाना -- कोई भी संस्वीकृति, जो किसी व्यक्ति ने उस समय की हो जब वह पुलिस ऑफिसर की अभिरक्षा में हो, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध साबित न की जाएगी, जब तक, कि वह मजिस्ट्रेट की साक्षात उपस्थिति में न की गई हो। स्पष्टीकरण -- इस धारा में “मजिस्ट्रेट" के अन्तर्गत फोर्ट सेन्ट जार्ज की प्रेसीडेन्सी में या अन्यत्र मजिस्ट्रेट के कृत्य निर्वहन करने वाला ग्रामणी नहीं आता है, जब तक कि वह ग्रामणी कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीज
27. अभियुक्त से प्राप्त जानकारी में से कितनी साबित की जा सकेगी -- परन्तु जब किसी तथ्य के बारे में यह अभिसाक्ष्य दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से, जो पुलिस ऑफिसर की अभिरक्षा में हो, प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप उसका पता चला है, तब ऐसी जानकारी में से, उतनी चाहे वह संस्वीकृति की कोटि में आती हो या नहीं, जितनी एतद्वारा पता चले हुए तथ्य से स्पष्टतया संबंधित है, साबित की जा सकेगी।
28. उत्प्रेरणा, धमकी या वचन से पैदा हए मन पर प्रभाव के दूर हो जाने के पश्चात् की गई संस्वीकृति सुसंगत है -- यदि ऐसी कोई संस्वीकृति, जैसी धारा 24 में निर्दिष्ट है, न्यायालय की राय में उसके मन पर प्रभाव के, जो ऐसी किसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन से कारित हुआ है, पूर्णतः दूर हो जाने के पश्चात् की गई है, तो वह सुसंगत है।
29. अन्यथा सुसंगत संस्वीकृति का गुप्त रखने के वचन आदि के कारण विसंगत न हो जाना -- यदि ऐसी संस्वीकृति अन्यथा सुसंगत है, तो वह केवल इसलिए कि वह गुप्त रखने के वचन के अधीन या उसे अभिप्राप्त करने के प्रयोजनार्थ अभियुक्त व्यक्ति से की गई प्रवंचना के परिणामस्वरूप, या उस समय जबकि वह मत्त था, की गई थी अथवा इसलिए कि ऐसे प्रश्नों के, चाहे उनका रूप कैसा ही क्यों न रहा हो, उत्तर में की गई थी जिनका उत्तर देना उसके लिए आवश्यक नहीं था, अथवा केवल इसलिए कि उसे यह चेतावनी नहीं दी गई थी कि वह ऐसी संस्वीकृति करने के
30. साबित संस्वीकृति को, जो उसे करने वाले व्यक्ति तथा एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित अन्य को प्रभावित करती है विचार में लेना -- जबकि एक से अधिक व्यक्ति एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित हैं, तथा ऐसे व्यक्तियों में से किसी एक के द्वारा, अपने को और ऐसे व्यक्तियों में से किसी अन्य को प्रभावित करने वाली की गई संस्वीकृति को साबित किया जाता है, तब न्यायालय ऐसी संस्वीकृति को ऐसे अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध तथा ऐसी संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध विचार में ले सकेगा। स्पष्टीक
31. स्वीकृतियाँ निश्चायक सबूत नहीं हैं, किन्तु विबंध कर सकती हैं -- स्वीकृतियाँ, स्वीकृत विषयों का निश्चायक सबूत नहीं हैं, किन्तु एतस्मिन् पश्चात् अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन विबंध के रूप में प्रवर्तित हो सकेंगे।
32. वे दशाऍं जिनमें उस व्‍यक्ति द्वारा सुसंगत तथ्‍य का किया कथन सुसंगत है, जो मर गया है या मिल नहीं सकता, इत्यादि -- सुसंगत तथ्यों के लिखित या मौखिक कथन, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा किए गए थे, जो मर गया है या मिल नहीं सकता है या जो साक्ष्य देने के लिए असमर्थ हो गया है या जिसकी हाजिरी इतने विलम्ब या व्यय के बिना उपाप्त नहीं की जा सकती, जितना मामले की परिस्थितियों में न्यायालय को अयुक्तियुक्त प्रतीत होता है निम्नलिखित दशाओं में स्वयंमेव सुसंगत है :- (1) जबकि वह मृत्यु के कारण से संबंध
33. किसी साक्ष्य में कथित तथ्यों की सत्यता को पश्चात्वर्ती कार्यवाही में साबित करने के लिए उस साक्ष्य की सुसंगति -- वह साक्ष्य, जो किसी साक्षी ने किसी न्यायिक कार्यवाही में, या विधि द्वारा उसे लेने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष दिया है, उन तथ्यों की सत्यता को, जो उस साक्ष्य में कथित है, किसी पश्चात्वर्ती न्यायिक कार्यवाही में या उसी न्यायिक कार्यवाही के आगामी प्रक्रम में साबित करने के प्रयोजन के लिए तब सुसंगत है, जबकि वह साक्षी मर गया है या मिल नहीं सकता है या वह साक्ष्य देने के लिए असम
34. लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियां, जिनके अंतर्गत वे भी हैं, जो इलेक्ट्रानिक रूप में रखी गई हों, कब सुसंगत हैं -- कारबार के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियां, जिनके अंतर्गत वे भी हैं, जो इलेक्ट्रानिक रूप में रखी गई हो जब कभी वे ऐसे विषय का निर्देश करती हैं जिसमें न्यायालय को जांच करनी है, सुसंगत है, किन्तु अकेले ऐसे कथन ही किसी व्यक्ति को दायित्व से भारित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं होंगे। दृष्टांत ख पर क 1,000 रुपयों के लिए वाद लाता है और अपनी लेखा बहियों की
35. कर्त्तव्य पालन में की गई लोक अभिलेख या इलेक्ट्रानिक अभिलेख की प्रविष्टियों की सुसंगति -- किसी लोक या अन्य राजकीय पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख या इलेक्ट्रानिक अभिलेख में की गई प्रविष्टि, जो किसी विवाद्यक या सुसंगत तथ्य का कथन करती है और किसी लोक सेवक द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्य के निर्वहन में या उस देश की, जिसमें ऐसी पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख या इलेक्ट्रानिक अभिलेख रखा जाता है, विधि द्वारा विशेष रूप से व्यादिष्ट कर्तव्य के पालन में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा की गई है, स्वयं सुसंगत तथ्य है।
36. मानचित्रों, चार्टों और रेखांकों के कथनों की सुसंगति -- विवाद्यक तथ्यों या सुसंगत तथ्यों के वे कथन, जो प्रकाशित मानचित्रों या चार्टों में, जो लोक विक्रय के लिए साधारणतः प्रस्थापित किए जाते हैं, अथवा केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के प्राधिकार के अधीन बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों में किए गए हैं उन विषयों के बारे में जो ऐसे मानचित्रों, चार्टों या रेखांकों में प्रायः रूपित या कथित होते हैं, स्वयं सुसंगत तथ्य हैं।
37. किन्हीं अधिनियमों या अधिसूचनाओं में अंतर्विष्ट लोक प्रकृति के तथ्य के बारे में कथन की सुसंगति -- जबकि न्यायालय को किसी लोक प्रकृति के तथ्य के अस्तित्व के बारे में राय बनानी है तब यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट के ऐक्ट में या किसी केन्द्रीय अधिनियम, प्रांतीय अधिनियम या राज्य अधिनियम में या शासकीय राजपत्र में प्रकाशित किसी सरकारी अधिसूचना या क्राउन रिप्रेजेटेटीव द्वारा की गई अधिसूचना में या लंदन गजट या हिज मजेस्टी के किसी डोमिनियन, उपनिवेश या कब्जाधीन क्षेत्र का सरकारी राजपत्र तात्पर्यित होने
38. विधि की पुस्तकों में अंतर्विष्ट किसी विधि के कथनों की सुसंगति -- जबकि न्यायालय को किसी देश की विधि के बारे में राय बनानी है, तब ऐसी विधि का कोई भी कथन, जो ऐसी किसी पुस्तक में अंतर्विष्ट है, जो ऐसे देश की सरकार के प्राधिकार के अधीन मुद्रित या प्रकाशित और ऐसी किसी विधि को अंतर्विष्ट करने वाली तात्पर्यित है, और ऐसे देश के न्यायालयों के किसी विनिर्णय की कोई रिपोर्ट जो ऐसी व्यवस्थाओं की रिपोर्ट से तात्पर्यिंत होने वाली किसी पुस्तक में अन्तर्विष्ट है, सुसंगत है।
39. जबकि कथन किसी बातचीत, दस्तावेज, इलेक्ट्रानिक अभिलेख, पुस्तक अथवा पत्रों या कागज-पत्रों की आवली का भाग हो, तब क्या साक्ष्य दिया जाए-- जबकि कोई कथन, जिसका साक्ष्य दिया जाता है, किसी वृहत्तर कथन का या किसी बातचीत का भाग है या किसी एकल दस्तावेज का भाग है या किसी ऐसी दस्तावेज में अंतर्विष्ट है, जो किसी पुस्तक का अथवा पत्रों या कागज-पत्रों की संसक्त आवली का भाग है या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के भाग में अंतर्विष्ट है, तब उस कथन, बातचीत, दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, पुस्तक अथवा पत्रों या कागज-पत्रों की
40. द्वितीय वाद या विचारण के वारणार्थ पूर्व निर्णय सुसंगत हैं -- किसी ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व, जो किसी न्यायालय को किसी वाद के संज्ञान से या कोई विचारण करने से विधि द्वारा निवारित करता है, सुसंगत तथ्य है जबकि प्रश्न यह हो कि क्या ऐसे न्यायालय को ऐसे वाद का संज्ञान या ऐसा विचारण करना चाहिए।
41. प्रोबेट इत्यादि विषयक अधिकारिता के किन्हीं निर्णयों की सुसंगति -- किसी सक्षम न्यायालय के प्रोबेट विषयक, विवाह विषयक, नावधिकरण विषयक या दिवाला विषयक अधिकारिता के प्रयोग में दिया हुआ अंतिम निर्णय, आदेश या डिक्री, जो किसी व्यक्ति को, या से कोई विधिक हैसियत प्रदान करती या ले लेती है या जो सर्वतः न कि किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति के विरुद्ध किसी व्यक्ति को ऐसी किसी हैसियत का हकदार या किसी विनिर्दिष्ट चीज का हकदार घोषित करती है, तब सुसंगत है जबकि ऐसी विधिक हैसियत, या किसी ऐसी चीज पर किसी ऐसे व्यक्ति क
42. धारा 41 में वर्णित से भिन्न निर्णयों, आदेशों या डिक्रियों की सुसंगति और प्रभाव -- वे निर्णय, आदेश या डिक्रियाँ जो धारा 41 में वर्णित से भिन्न हैं, यदि वे जांच में सुसंगत लोक प्रकृति की बातों से संबंधित हैं, तो वे सुसंगत हैं, किन्तु ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्रियाँ उन बातों का निश्चायक सबूत नहीं हैं जिनका वे कथन करती हैं। दृष्टांत क अपनी भूमि पर अतिचार के लिए ख पर वाद लाता है। ख उस भूमि पर मार्ग के लोक अधिकार का अस्तित्व अभिकथित करता है जिसका क प्रत्याख्यान करता है। क द्वारा ग के विरुद्ध उस
43. धाराओं 40 से 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय आदि कब सुसंगत हैं -- धाराएँ 40, 41 और 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय, आदेश या डिक्रियाँ विसंगत हैं जब तक कि ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व विवाद्यक तथ्य न हो या वह इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अन्तर्गत सुसंगत न हो। दृष्टांत (क) क और ख किसी अपमान लेख के लिए जो उनमें से हर एक पर लांछन लगाता है, ग पर पृथक्-पृथक् वाद लाते हैं। हर एक मामले में ग कहता है कि वह बात, जिसका अपमान-लेखीय होना अभिकथित है, सत्य है और परिस्थितियाँ ऐसी
44. निर्णय अभिप्राप्त करने में कपट या दस्संधि अथवा न्यायालय की अक्षमता साबित की जा सकेगी -- वाद या अन्य कार्यवाही का कोई भी पक्षकार यह दर्शित कर सकेगा कि कोई निर्णय, आदेश या डिक्री जो धारा 40, 41 या 42 के अधीन सुसंगत है और जो प्रतिपक्षी द्वारा साबित की जा चुकी है, ऐसे न्यायालय द्वारा दी गई थी, जो उसे देने के लिए अक्षम था, या कपट या दुस्संधि द्वारा अभिप्राप्त की गई थी।
45. विशेषज्ञों की राय-- जब कि न्यायालय को विदेशी विधि की या विज्ञान की या कला की किसी बात पर या हस्तलेख या अंगुली चिह्नों की अनन्यता के बारे में राय बनानी हो तो तब उस बात पर ऐसी विदेशी विधि, विज्ञान या . कला में या हस्तलेख या अंगुली चिह्नों की अनन्यता विषयक प्रश्नों में विशेष कुशल व्यक्तियों की राय सुसंगत तथ्य हैं। ऐसे व्यक्ति विशेषज्ञ कहलाते हैं। दृष्टांत (क)  प्रश्न यह है कि क्या क की मृत्यु विष द्वारा कारित हुई। जिस विष के बारे में अनुमान है कि उससे क की मृत्यु हुई है, उस विष से पैदा
45-क. इलेक्ट्रानिक साक्ष्य के परीक्षक की राय -- जब न्यायालय को किसी कार्यवाही में किसी कम्प्यूटर साधन या किसी अन्य इलेक्ट्रानिक या अंकीय रूप से पारेषित या भंडारित किसी सूचना से संबंधित किसी विषय पर कोई राय बनानी होती है तब सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) की धारा 79-क में निर्दिष्ट इलेक्ट्रानिक साक्ष्य के परीक्षक की राय सुसंगत तथ्य है। स्पष्टीकरण -- इस धारा के प्रयोजनों के लिये, इलेक्ट्रानिक साक्ष्य का कोई परीक्षक, विशेषज्ञ होगा।
46. विशेषज्ञों की रायों से संबंधित तथ्य -- वे तथ्य, जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं, सुसंगत होते हैं, यदि वे विशेषज्ञों की रायों का समर्थन करते हों या उनसे असंगत हों जबकि ऐसी रायें सुसंगत हों। दृष्टांत (क) प्रश्न यह है कि क्या क को अमुक विष दिया गया था। यह तथ्य सुसंगत है कि अन्य व्यक्तियों में भी, जिन्हें वह विष दिया गया था, अमुक लक्षण प्रकट हुए थे, जिनका उस विष के लक्षण होना विशेषज्ञ प्रतिज्ञात या प्रत्याख्यात करते हैं। (ख) प्रश्न यह है कि क्या किसी बंदरगाह में कोई बाधा अमुक समुद्र-भित्ति से
47. हस्तलेख के बारे में राय कब सुसंगत है -- जबकि न्यायालय को राय बनानी हो कि कोई दस्तावेज किस व्यक्ति ने लिखी या हस्ताक्षरित की थी, तब उस व्यक्ति के हस्तलेख से, जिसके द्वारा वह लिखी या हस्ताक्षरित की गई अनुमानित की जाती है, परिचित किसी व्यक्ति की यह राय कि वह उस व्यक्ति द्वारा लिखी या हस्ताक्षरित की गई थी अथवा लिखी या हस्ताक्षरित नहीं की गई थी, सुसंगत तथ्य है। स्पष्टीकरण -- कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के हस्तलेख से परिचित तब कहा जाता है, जबकि उसने उस व्यक्ति को लिखते देखा है या जबकि स्वयं अ
47-क. इलेक्ट्रानिक चिह्नक के बारे में राय कब सुसंगत है -- जब न्यायालय को किसी व्यक्ति के इलेक्ट्रानिक चिह्नक के बारे में राय बनानी हो, तब उस प्रमाणकर्ता प्राधिकारी की राय, जिसने इलेक्ट्रानिक चिह्नक प्रमाणपत्र जारी किया है, सुसंगत तथ्य है।
48. अधिकार या रूढ़ि के अस्तित्व के बारे में रायें कब सुसंगत हैं -- जबकि न्यायालय को किसी साधारण रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के बारे में राय बनानी हो, तब ऐसी रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के बारे में उन व्यक्तियों की रायें सुसंगत हैं, जो यदि उसका अस्तित्व होता तो संभाव्यतः उसे जानते होते। स्पष्टीकरण -- “साधारण रूढिया अधिकार” के अंतर्गत ऐसी रूढ़ियाँ या अधिकार आते हैं जो व्यक्तियों के किसी काफी बड़े वर्ग के लिए सामान्य हैं। दृष्टांत किसी विशिष्ट ग्राम के निवासियों का अमुक कूप के पानी का उपयोग कर
49. प्रथाओं, सिद्धांतों आदि के बारे में रायें कब सुसंगत हैं -- जबकि न्यायालय को-- मनुष्यों के किसी निकाय या कुटुम्ब की प्रथाओं और सिद्धांतों के, किसी धार्मिक या खैराती प्रतिष्ठान के संविधान और शासन के, अथवा विशिष्ट जिले में या विशिष्ट वर्गों के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले शब्दों या पदों के अर्थों के बारे में राय बनानी हो, तब उनके संबंध में ज्ञान के विशेष साधन रखने वाले व्यक्तियों की रायें सुसंगत तथ्य हैं।
50. नातेदारी के बारे में राय कब सुसंगत है -- जबकि न्यायालय को एक व्यक्ति की किसी अन्य के साथ नातेदारी के बारे में राय बनानी हो, तब ऐसी नातेदारी के अस्तित्व के बारे में ऐसे किसी व्यक्ति के आचरण द्वारा अभिव्यक्त राय, जिसके पास कुटुम्ब के सदस्य के रूप में या अन्यथा उस विषय के संबंध में ज्ञान के विशेष साधन हैं, सुसंगत तथ्य है : परन्तु भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम, 1869 (1869 का 4) के अधीन कार्यवाहियों में या भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 494, 495, 497 या 498 के अधीन अभियोजनों में ऐसी रा
51. राय के आधार कब सुसंगत हैं -- जब कभी किसी जीवित व्यक्ति की राय सुसंगत है, तब वे आधार भी जिन पर वह आधारित है, सुसंगत है। दृष्टांत कोई विशेषज्ञ अपनी राय बनाने के प्रयोजनार्थ किए हुए प्रयोगों का विवरण दे सकता है।
52. सिविल मामलों में अध्यारोपित आचरण साबित करने के लिए शील विसंगत है -- सिविल मामलों में यह तथ्य कि किसी सम्पृक्त व्यक्ति का शील ऐसा हैं कि जो उस पर अध्यारोपित किसी आचरण को अधिसंभाव्य या अनधिसंभाव्य बना देता है, विसंगत है वहां तक के सिवाय जहां तक कि ऐसा शील अन्यथा सुसंगत तथ्यों से प्रकट होता है।
53. दाण्डिक मामलों में पूर्वतन अच्छा शील सुसंगत है -- दाण्डिक कार्यवाहियों में यह तथ्य सुसंगत है कि अभियुक्त व्यक्ति अच्छे शील का है।
53-क. कतिपय मामलों में शील या पूर्व लैंगिक अनुभव के साक्ष्य का सुसंगत न होना -- भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 376, धारा 376क, धारा 376कख, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376घक, धारा 376घख या धारा 376ङ के अधीन किसी अपराध के लिए किसी अभियोजन में या किसी ऐसे अपराध के करने के प्रयत्न के लिए, जहां सम्मति का प्रश्न विवाद्य है, वहां पीड़िता के शील या ऐसे व्यक्ति का किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैंगिक अनुभव का साक्ष्य ऐसी सम्मति या सम्मत
54. उत्तर में होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है -- दाण्डिक कार्यवाहियों में यह तथ्य कि अभियुक्त व्यक्ति बुरे शील का है, विसंगत है, जब तक कि इस बात का साक्ष्य न दिया गया हो कि वह अच्छे शील का है, जिसके दिए जाने की दशा में वह सुसंगत हो जाता है। स्पष्टीकरण 1 -- यह धारा उन मामलों को लागू नहीं है, जिनमें किसी व्यक्ति का बुरा शील स्वयं विवाद्यक तथ्य है। स्पष्टीकरण 2 -- पूर्व दोषसिद्धि बुरे शील के साक्ष्य के रूप में सुसंगत है। -- दाण्डिक कार्यवाहियों में यह तथ्य कि अभियुक्त व्यक्ति
55. नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील -- सिविल मामलों में यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का शील ऐसा है जिससे नुकसानी की रकम पर, जो उसे मिलनी चाहिए प्रभाव पड़ता है, सुसंगत है। स्पष्टीकरण -- धारा 52, 53, 54 और 55 में “शील" शब्द के अन्तर्गत ख्याति और स्वभाव दोनों आते हैं, किन्तु धारा 54 में यथा उपबंधित के सिवाय केवल साधारण ख्याति व साधारण स्वभाव का ही न कि ऐसे विशिष्ट कार्यों का, जिनके द्वारा, ख्याति या स्वभाव दर्शित हुए थे, साक्ष्य दिया जा सकेगा।
भाग 2 : सबूत के विषय में अध्याय 3 : तथ्य, जिनका साबित किया जाना आवश्यक नहीं है 56. न्यायिक रूप से अवेक्षणीय तथ्य साबित करना आवश्यक नहीं है -- जिस तथ्य की न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करेगा, उसे साबित करना आवश्यक नहीं है।
57. वे तथ्य, जिनकी न्यायिक अवेक्षा न्यायालय को करनी होगी -- न्यायालय निम्नलिखित तथ्यों की न्यायिक अवेक्षा करेगा-- (1) भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त समस्त विधियाँ; (2) यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेण्ट द्वारा पारित या एतद्पश्चात् पारित किए जाने वाले समस्त पब्लिक ऐक्ट तथा वे समस्त स्थानीय और पर्सनल ऐक्ट जिनके बारे में यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेण्ट ने निर्दिष्ट किया है कि उनकी न्यायिक अवेक्षा की जाए; (3) भारतीय सेना, नौसेना या वायुसेना के लिए युद्ध की नियमावली; (4)
58. स्वीकृत तथ्यों को साबित करना आवश्यक नहीं है -- किसी ऐसे तथ्य को किसी कार्यवाही में साबित करना आवश्यक नहीं है, जिसे उस कार्यवाही के पक्षकार या उनके अभिकर्ता सुनवाई पर स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाते हैं, या जिसे वे सुनवाई के पूर्व किसी स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाते हैं या जिसके बारे में अभिवचन संबंधी किसी तत्समय प्रवृत्त नियम के अधीन यह समझ लिया जाता है कि उन्होंने उसे अपने अभिवचनों द्वारा स्वीकार कर लिया है : परन्तु न्यायालय स्वीकृत तथ्यों को ऐसी स्वीकृतियों
अध्याय 4 : मौखिक साक्ष्य के विषय में 59. मौखिक साक्ष्य द्वारा तथ्यों का साबित किया जाना -- दस्तावेजों या इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु के सिवाय सभी तथ्य मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित किए जा सकेंगे।
60. मौखिक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाहिए -- मौखिक साक्ष्य, समस्त अवस्थाओं में चाहे वे कैसी ही हों, प्रत्यक्ष ही होगा, अर्थात्-- यदि वह किसी देखे जा सकने वाले तथ्य के बारे में है, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा, जो कहता है कि उसने उसे देखा; यदि वह किसी सुने जा सकने वाले तथ्य के बारे में है, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहता है कि उसने उसे सुना; यदि वह किसी ऐसे तथ्य के बारे में है जिसका किसी अन्य इंद्रिय द्वारा या किसी अन्य रीति से बोध हो सकता था, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष
अध्याय 5 : दस्तावेजी साक्ष्य के विषय में 61. दस्तावेजों की अंतर्वस्तु का सबूत -- दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु या तो प्राथमिक या द्वितीयक साक्ष्य द्वारा साबित की जा सकेगी।
62. प्राथमिक साक्ष्य -- प्राथमिक साक्ष्य से न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गई दस्तावेज स्वयं अभिप्रेत है। स्पष्टीकरण 1 -- जहां कि कोई दस्तावेज कई मूल प्रतियों में निष्पादित है, वहां हर एक मूल प्रति उस दस्तावेज का प्राथमिक साक्ष्य है। जहां कि कोई दस्तावेज प्रतिलेख में निष्पादित है और हर एक प्रतिलेख पक्षकारों में से केवल एक पक्षकार या कुछ पक्षकारों द्वारा निष्पादित किया गया है, वहां हर एक प्रतिलेख उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होंने उसका निष्पादन किया है, प्राथमिक साक्ष्य है। स्पष्टीकर
63. द्वितीयक साक्ष्य -- द्वितीयक साक्ष्य से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आते हैं-- (1) एतस्मिन् पश्चात् अन्तर्विष्ट उपबंधों के अधीन दी हुई प्रमाणित प्रतियाँ; (2) मूल से ऐसी यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा, जो प्रक्रियाएं स्वयं ही प्रति की शुद्धता सुनिश्चित करती हैं, बनाई गई प्रतियाँ तथा ऐसी प्रतियों से तुलना की हुई प्रतिलिपियाँ; (3) मूल से बनाई गई या तुलना की गई प्रतियाँ; (4) उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होने उन्हें निष्पादित नहीं किया है, दस्तावेजों के प्रतिलेख; (5) किसी दस्तावेज की
64. दस्तावेजों का प्राथमिक साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना -- दस्तावेजें एतस्मिन् पश्चात् वर्णित अवस्थाओं के सिवाय प्राथमिक साक्ष्य द्वारा साबित करनी होंगी।
65. अवस्थाएं जिनमें दस्तावेजों के संबंध में द्वितीयक साक्ष्य दिया जा सकेगा -- किसी दस्तावेज के अस्तित्व, दशा या अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य निम्नलिखित अवस्थाओं में दिया जा सकेगा :- (क) जबकि यह दर्शित कर दिया जाए या प्रतीत होता हो कि मूल ऐसे व्यक्ति के कब्जे में या शक्त्यधीन है - जिसके विरुद्ध उस दस्तावेज को साबित किया जाना ईप्सित है, अथवा जो न्यायालय की आदेशिका की पहुंच के बाहर है, या ऐसी आदेशिका के अध्यधीन नहीं है, अथवा जो उसे पेश करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है, और जबकि ऐसा व्य
65-क. इलेक्ट्रानिक अभिलेख से संबंधित साक्ष्य के बारे में विशेष उपबंध -- इलेक्ट्रानिक अभिलेख की अंतर्वस्तु धारा 65-ख के उपबंधों के अनुसार साबित की जा सकेगी।
65-ख. इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की ग्राह्यता -- (1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, किसी इलेक्ट्रानिक अभिलेख में अंतर्विष्ट किसी सूचना को भी, जो कम्प्यूटर द्वारा उत्पादित और किसी कागज पर मुद्रित, प्रकाशीय या चुम्बकीय मीडिया में भण्डारित, अभिलिखित या नकल की गई हो (जिसे इसमें इसके पश्चात् कम्प्यूटर निर्गम कहा गया है), तब एक दस्तावेज समझा जाएगा, यदि प्रश्नगत सूचना और कम्प्यूटर के संबंध में, इस धारा में उल्लिखित शर्ते पूरी कर दी जाती हैं और वह मूल की किसी अंतर्वस्तु या उसमें कथित किसी तथ्य
66. पेश करने की सूचना के बारे में नियम -- धारा 65, खण्ड (क) में निर्दिष्ट दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य तब तक न दिया जा सकेगा, जब तक ऐसे द्वितीयक साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाले . पक्षकार ने उस पक्षकार को जिसके कब्जे में या शक्त्यधीन वह दस्तावेज है या उसके अटर्नी या प्लीडर को उसे पेश करने के लिए ऐसी सूचना, जैसी कि विधि द्वारा विहित है, और यदि विधि द्वारा कोई सूचना विहित नहीं हो तो ऐसी सूचना जैसी न्यायालय मामले की परिस्थितियों के अधीन यक्तियुक्त समझता है न दे दी हो : परन्त
67. जिस व्यक्ति के बारे में अभिकथित है कि उसने पेश की गई दस्तावेज को हस्ताक्षरित किया था या लिखा था उस व्यक्ति के हस्ताक्षर और हस्तलेख का साबित किया जाना -- यदि कोई दस्तावेज किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित या पूर्णतः या भागतः लिखी गई अभिकथित है, तो यह साबित करना होगा कि वह हस्ताक्षर या उस दस्तावेज के उतने का हस्तलेख, जितने के बारे में यह अभिकथित है कि वह उस व्यक्ति के हस्तलेख में है, उसके हस्तलेख में है।
67-क. इलेक्ट्रानिक चिह्नक के बारे में सबूत -- सुरक्षित इलेक्ट्रानिक चिह्नक की दशा में के सिवाय, यदि यह अभिकथित है कि किसी हस्ताक्षरकर्ता का इलेक्ट्रानिक चिह्नक इलेक्ट्रानिक अभिलेख में लगाया गया है तो यह तथ्य साबित किया जाना चाहिए कि ऐसा इलेक्ट्रानिक चिह्नक हस्ताक्षरकर्ता का इलेक्ट्रानिक चिह्नक है।
68. ऐसी दस्तावेज के निष्पादन का साबित किया जाना जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है -- यदि किसी दस्तावेज का अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है, तो उसे साक्ष्य के रूप में उपयोग में न लाया जाएगा, जब तक कि कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी, यदि कोई अनुप्रमाणक साक्षी जीवित और न्यायालय की आदेशिका के अध्यधीन हो तथा साक्ष्य देने के योग्य हो, उसका निष्पादन साबित करने के प्रयोजन से न बुलाया गया हो : परन्तु ऐसी किसी दस्तावेज के निष्पादन को साबित करने के लिए, जो विल नहीं है, और जो भारतीय रज
69. जब किसी भी अनुप्रमाणक साक्षी का पता न चले, तब सबूत -- यदि ऐसे किसी अनुप्रमाणक साक्षी का पता न चल सके अथवा यदि दस्तावेज का यूनाइटेड किंगडम में निष्पादित होना तात्पर्यित हो तो यह साबित करना होगा कि कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी का अनुप्रमाण उसी के हस्तलेख में है, तथा यह कि दस्तावेज का निष्पादन करने वाले व्यक्ति का हस्ताक्षर उसी व्यक्ति के हस्तलेख में है।
70. अनुप्रमाणित दस्तावेज के पक्षकार द्वारा निष्पादन की स्वीकृति -- अनुप्रमाणित दस्तावेज के किसी पक्षकार की अपने द्वारा उसका निष्पादन करने की स्वीकृति उस दस्तावेज के निष्पादन का उसके विरुद्ध पर्याप्त सबूत होगा, यद्यपि वह ऐसी दस्तावेज हो जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है।
71. जबकि अनुप्रमाणक साक्षी निष्पादन का प्रत्याख्यान करता है, तब सबूत -- यदि अनुप्रमाणक साक्षी दस्तावेज के निष्पादन का प्रत्याख्यान करे या उसे उसके निष्पादन का स्मरण न हो, तो उसका निष्पादन अन्य साक्ष्य द्वारा साबित किया जा सकेगा।
72. उस दस्तावेज का साबित किया जाना जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है -- कोई अनुप्रमाणित दस्तावेज, जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है, ऐसे साबित की जा सकेगी, मानो वह अनुप्रमाणित नहीं हो।
73. हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा की तुलना अन्यों से जो स्वीकृत या साबित हैं -- यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या कोई हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा उस व्यक्ति की है, जिसके द्वारा उसका लिखा या किया जाना तात्पर्यिंत है, किसी हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा की जिसके बारे में, यह स्वीकृत है या न्यायालय को समाधानप्रद रूप में साबित कर दिया गया है कि वह उस व्यक्ति द्वारा लिखा या किया गया था, उससे जिसे साबित किया जाना है, तुलना की जा सकेगी, यद्यपि वह हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा किसी अन्य प्रयोजन के लिए पेश या साबित न की गई
73-क. अंकीय चिह्न के सत्यापन के बारे में सबूत -- यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या कोई अंकीय चिह्नक उस व्यक्ति का है जिसके द्वारा उसका लगाया जाना तात्पर्यित है, न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि :- (क) वह व्यक्ति या नियंत्रक या प्रमाणकर्ता प्राधिकारी अंकीय चिह्नक प्रमाण-पत्र पेश करे; (ख) कोई अन्य व्यक्ति अंकीय चिह्नक प्रमाण-पत्र में सूचीबद्ध लोक कुंजी के लिए आवेदन करे और उस अंकीय चिह्नक को जिसका उस व्यक्ति द्वारा लगाया जाना तात्पर्यित है, सत्यापित करे। स्पष्टीकरण -- इस धारा के प्रयोजनों के
74. लोक दस्तावेजें -- निम्नलिखित दस्तावेजें लोक दस्तावेजें हैं :- (1) वे दस्तावेजें जो :- (i) प्रभुत्तासम्पन्न प्राधिकारी के, तथा (ii) शासकीय निकायों और अधिकरणों के, तथा (iii) भारत के किसी भाग के या कामनवेल्थ के या किसी विदेश के विधायी, न्यायिक तथा कार्यपालक लोक ऑफिसरों के, कार्यों के रूप में या कार्यों के अभिलेख के रूप में हैं; (2) किसी राज्य में रखे गए प्राइवेट दस्तावेजों के लोक अभिलेख।
75. प्राइवेट दस्तावेजें -- अन्य सभी दस्तावेजें प्राइवेट है।
76. लोक-दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां -- हर लोक ऑफिसर जिसकी अभिरक्षा में कोई ऐसी लोक दस्तावेज है, जिसके निरीक्षण करने का किसी भी व्यक्ति को अधिकार है, मांग किए जाने पर उस व्यक्ति को उसकी प्रति उसके लिए विधिक फीस चुकाए जाने पर प्रति के नीचे इस लिखित प्रमाण-पत्र के सहित देगा कि वह, यथास्थिति, ऐसी दस्तावेज की या उसके भाग की शुद्ध प्रति है तथा ऐसा प्रमाण-पत्र ऐसे ऑफिसर द्वारा दिनांकित किया जाएगा और उसके नाम और पदाभिधान से हस्ताक्षरित किया जाएगा तथा जब कभी ऐसा ऑफिसर विधि द्वारा किसी मुद्रा का उपयोग
77. प्रमाणित प्रतियों के पेश करने द्वारा दस्तावेजों का सबूत -- ऐसी प्रमाणित प्रतियाँ उन लोक दस्तावेजों की या उन लोक दस्तावेज के भागों की अंतर्वस्तु के सबूत में पेश की जा सकेगी जिनकी वे प्रतियाँ होना तात्पर्यित है।
78. अन्य शासकीय दस्तावेजों का सबूत -- निम्नलिखित लोक दस्तावेजें निम्नलिखित रूप से साबित की जा सकेंगी:- (1) केन्द्रीय सरकार के किसी विभाग के, या क्राउन रिप्रेजेण्टेटिव के या किसी राज्य सरकार के, या किसी राज्य सरकार के किसी विभाग के कार्य, आदेश या अधिसूचनाएं-- उन विभागों के अभिलेखों द्वारा, जो क्रमशः उन विभागों के मुख्य पदाधिकारियों द्वारा प्रमाणित हैं, या किसी दस्तावेज द्वारा जो ऐसी किसी सरकार के या यथास्थिति क्राउन रिप्रेजेण्टेटिव के आदेश द्वारा मुद्रित हुई तात्पर्यित है; (2) विधान मण्ड
दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएँ 79. प्रमाणित प्रतियों के असली होने के बारे में उपधारणा -- न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा जो ऐसा प्रमाणपत्र, प्रमाणित प्रति या अन्य दस्तावेज होनी तात्पर्यित है, जिसका किसी विशिष्ट तथ्य के साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होना विधि द्वारा घोषित है और जिसका केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के किसी ऑफिसर द्वारा या जम्मू-कश्मीर राज्य के किसी ऐसे ऑफिसर द्वारा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इसके लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत हो सम्यक रूप से प्रमाणित होना ता
80. साक्ष्य के अभिलेख के तौर पर पेश की गई दस्तावेजों के बारे में उपधारणा -- जब कभी किसी न्यायालय के समक्ष कोई ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है, जिसका किसी न्यायिक कार्यवाही में, या विधि द्वारा ऐसा साक्ष्य लेने के लिए प्राधिकृत किसी ऑफिसर के समक्ष, किसी साक्षी द्वारा दिए गए साक्ष्य या साक्ष्य के किसी भाग का अभिलेख या ज्ञापन होना, अथवा किसी कैदी या अभियुक्त का विधि के अनुसार लिया गया कथन या संस्वीकृति होना तात्पर्यित हो और जिसका किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा या उपर्युक्त जैसे किसी ऑफिसर द्वारा हस
81. राजपत्रों, समाचारपत्रों, पार्लियामेन्ट के प्राइवेट एक्टों और अन्य दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएं -- न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा जिसका लंदन गजट, या कोई शासकीय राजपत्र या ब्रिटिश क्राउन के किसी उपनिवेश, आश्रित देश या कब्जाधीन क्षेत्र का सरकारी राजपत्र होना या कोई समाचार पत्र या जर्नल होना, या यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेन्ट के प्राइवेट ऐक्ट की क्वीन्स प्रिन्टर द्वारा मुद्रित प्रति होना, तात्पर्यित है तथा हर ऐसी दस्तावेज का, जिसका ऐसी दस्तावेज होना, तात्पर्यित है जिसक
81-क. इलेक्ट्रानिक रूप में राजपत्र के बारे में उपधारणा -- न्यायालय, ऐसे प्रत्येक इलेक्ट्रानिक अभिलेख का असली होना उपधारित करेगा, जिसका शासकीय राजपत्र होना तात्पर्यित है या जिसका ऐसा इलेक्ट्रानिक अभिलेख होना तात्पर्यित है, जिसका किसी व्यक्ति द्वारा रखा जाना किसी विधि द्वारा निर्दिष्ट है, यदि ऐसा इलेक्ट्रानिक अभिलेख सारतः उस रूप में रखा गया हो, जो विधि द्वारा अपेक्षित है और उचित अभिरक्षा से पेश किया गया हो। स्पष्टीकरण -- इलेक्ट्रानिक अभिलेख का उचित अभिरक्षा में होना कहा जाता है, यदि वे ऐसे स्था
82. मुद्रा या हस्ताक्षर के सबूत के बिना इंग्लैण्ड में ग्राह्य दस्तावेज के बारे में उपधारणा -- जबकि किसी न्यायालय के समक्ष कोई ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है जिसका ऐसी दस्तावेज होना तात्पर्यित है जो इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड के किसी न्यायालय में किसी विशिष्ट को साबित करने के लिए उस दस्तावेज को अधिप्रमाणीकृत करने वाली मुद्रा या स्टांप या हस्ताक्षर को या उस व्यक्ति द्वारा, जिसके द्वारा उसका हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है, दावाकृत न्यायिक या पदीय हैसियत को साबित किये बिना इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड में तत्
83. सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित करेगा कि वे मानचित्र या रेखांक जो, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए तात्पर्यित हैं, वैसे ही बनाए गए थे और वे शुद्ध हैं, किन्तु किसी मामले के प्रयोजनों के लिए बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में यह साबित करना होगा कि वे सही हैं।
84. विधियों के संग्रह और विनिश्चयों की रिपोर्टों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय हर ऐसी पुस्तक का जिसका किसी देश की सरकार के प्राधिकार के अधीन मुद्रित या प्रकाशित होना और जिसमें उस देश की कोई विधियाँ अन्तर्विष्ट होना तात्पर्यित है। तथा हर ऐसी पुस्तक का, जिसमें उस देश के न्यायालय के विनिश्चयों की रिपोर्ट अन्तर्विष्ट होना तात्पर्यित है, असली होना उपधारित करेगा।
85. मुख्तारनामों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित करेगा कि हर ऐसी दस्तावेज जिसका मुख्तारनामा होना और नोटरी पब्लिक या किसी न्यायालय, न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, भारतीय कौन्सल या उपकौन्सल या केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि के समक्ष निष्पादित और उस द्वारा अधिप्रमाणीकृत होना तात्पर्यित है, ऐसे निष्पादित और अधिप्रमाणीकृत की गई थी।
85-क. इलेक्ट्रानिक करारों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित करेगा कि हर ऐसा इलेक्ट्रानिक अभिलेख, जिसका ऐसा करार होना तात्पर्यित है जिस पर पक्षकारों के इलेक्ट्रानिक चिह्नक हैं, पक्षकारों के इलेक्ट्रानिक चिह्नक लगाकर किया गया था।
85-ख. इलेक्ट्रानिक अभिलेखों और इलेक्ट्रानिक चिह्नक के बारे में उपधारणा -- (1) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनमें सुरक्षित इलेक्ट्रानिक अभिलेख अंतर्वलित हैं, जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय यह उपधारित करेगा कि सुरक्षित इलेक्ट्रानिक अभिलेख किसी ऐसे विनिर्दिष्ट समय से, जिससे सुरक्षित प्रास्थिति संबंधित है, परिवर्तित नहीं किया गया है। (2) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनमें सुरक्षित इलेक्ट्रानिक चिह्नक अंतर्वलित हैं, जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्या
85-ग. इलेक्ट्रानिक चिह्नक प्रमाण-पत्र के बारे में उपधारणा -- जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय, यह उपधारित करेगा कि यदि उपयोगकर्ता द्वारा प्रमाणपत्र को स्वीकार किया गया था तो इलेक्ट्रानिक चिह्नक प्रमाण-पत्र में सूचीबद्ध सूचना सही है, सिवाय उस सूचना के जो उपयोगकर्ता की सूचना के रूप में विनिर्दिष्ट है जिसे सत्यापित नहीं किया गया है।
86. विदेशी न्यायिक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसे किसी देश के, जो भारत का या हर मजेस्टी के अधिक्षेत्रों का भाग नहीं है न्यायिक अभिलेख की प्रमाणित प्रति तात्पर्यित होने वाली कोई दस्तावेज असली और शुद्ध है, यदि वह दस्तावेज किसी ऐसी रीति से प्रमाणित हुई तात्पर्यित हो जिसका न्यायिक अभिलेखों की प्रतियों के प्रमाणन के लिए उस देश में साधारणतः काम में लाई जाने वाली रीति होना ऐसे देश में या के लिए केन्द्रीय सरकार के किसी प्रतिनिधि द्वारा प्रमाणित ह
87. पुस्तकों, मानचित्रों और चार्टों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि कोई पुस्तक, जिसे वह लोक या साधारण हित संबंधी बातों की जानकारी के लिए देखे और कोई प्रकाशित मानचित्र या चार्ट, जिसके कथन सुसंगत तथ्य हैं, और जो उसके निरीक्षणार्थ पेश किया गया है, उस व्यक्ति द्वारा तथा उस समय और उस स्थान पर लिखा गया और प्रकाशित किया गया था जिनके द्वारा या जिस समय या जिस स्थान पर उसका लिखा जाना या प्रकाशित होना तात्पर्यित है।
88. तार संदेशों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि कोई संदेश, जो किसी तार घर से उस व्यक्ति को भेजा गया है, जिसे ऐसे संदेश का संबोधित होना तात्पर्यित है, उस संदेश के समरूप है जो भेजे जाने के लिए उस कार्यालय को, जहां से वह संदेश पारेषित किया गया तात्पर्यित है, परिदत्त किया गया था, किन्तु न्यायालय उस व्यक्ति के बारे में, जिसने संदेश पारेषित किए जाने के लिए परिदत्त किया था, कोई उपधारणा नहीं करेगा।
88-क. इलेक्ट्रानिक संदेशों के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि प्रवर्तक द्वारा ऐसे प्रेषिती को किसी इलेक्ट्रानिक डाक परिसेवक के माध्यम से अग्रेषित कोई इलेक्ट्रानिक संदेश, जिसे ऐसे संदेश का संबोधित किया जाना तात्पर्यित है, उस संदेश के समरूप है, जो पारेषण के लिए उसके कम्प्यूटर में भरा गया था; किन्तु न्यायालय, उस व्यक्ति के बारे में, जिसके द्वारा ऐसा संदेश भेजा गया था, कोई उपधारणा नहीं करेगा। स्पष्टीकरण -- इस धारा के प्रयोजनों के लिए "प्रेषिती" और "प्रवर्तक" पदों के वही अर्थ ह
89. पेश न की गई दस्तावेजों के सम्यक् निष्पादन आदि के बारे में उपधारणा -- न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि हर दस्तावेज, जिसे पेश करने की अपेक्षा की गई थी और जो पेश करने की सूचना के पश्चात पेश नहीं की गई है, विधि द्वारा अपेक्षित प्रकार से अनुप्रमाणित, स्टांपित और निष्पादित की गई थी।
90. तीस वर्ष पुरानी दस्तावेजों के बारे में उपधारणा -- जहां कि कोई दस्तावेज, जिसका तीस वर्ष पुरानी होना तात्पर्यित है या साबित किया गया है, ऐसी किसी अभिरक्षा में से, जिसे न्यायालय उस विशिष्ट मामले में उचित समझता है, पेश की गई है, वहां न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर और उसका हर अन्य भाग, जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तलेख में होना तात्पर्यित है, उस व्यक्ति के हस्तलेख में है, और निष्पादित या अनुप्रमाणित दस्तावेज होने की दशा में यह उपधारित कर सकेगा कि वह उन व्यक्तियों द्
90-क. पाँच वर्षीय पुराने इलेक्ट्रानिक अभिलेखों के बारे में उपधारणा -- जहां कोई इलेक्ट्रानिक अभिलेख, जिसका पाँच वर्ष पुराना होना तात्पर्यित है या साबित किया गया है, ऐसी किसी अभिरक्षा से जिसे न्यायालय उस विशिष्ट मामले में उचित समझता है पेश किया गया है, वहां न्यायालय, यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसा इलेक्ट्रानिक चिह्नक, जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति का इलेक्ट्रानिक चिह्नक होना तात्पर्यित है, उसके द्वारा या उसकी ओर से इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा लगाया गया था। स्पष्टीकरण -- इलेक्ट्रानिक अभिले
91. दस्तावेजों के रूप में लेखबद्ध संविदाओं, अनुदानों तथा संपत्ति के अन्य व्ययनों के अनिबंधनों का साक्ष्य -- जबकि किसी संविदा के या अनुदान के या संपत्ति के किसी अन्य व्ययन के निबंधन दस्तावेज के रूप में लेखबद्ध कर लिए गए हों तब, तथा उन सब दशाओं में, जिनमें विधि द्वारा अपेक्षित है कि कोई बात दस्तावेज के रूप में लेखबद्ध की जाए, ऐसी संविदा, अनुदान या संपत्ति के अन्य व्ययन के निबंधनों के या ऐसी बात के साबित किए जाने के लिए स्वयं उस दस्तावेज के सिवाय, या उन दशाओं में जिनमें एतस्मिनपूर्व अन्तर्विष्ट उपब
92. मौखिक करार के साक्ष्य का अपवर्जन -- जबकि किसी ऐसी संविदा, अनुदान या सम्पत्ति के अन्य व्ययन के निबंधनों को, या किसी बात को, जिनके बारे में विधि द्वारा अपेक्षित है कि वह दस्तावेज के रूप में लेखबद्ध की जाए, अंतिम पिछली धारा के अनुसार साबित किया जा चुका हो, तब ऐसी किसी लिखत के पक्षकारों या उनके हित प्रतिनिधियों के बीच के किसी मौखिक करार या कथन का कोई भी साक्ष्य उसके निबंधनों का खण्डन करने के या उनमें फेरफार करने के या जोड़ने के या उनमें से घटाने के प्रयोजन के लिए ग्रहण न किया जाएगा :
93. संदिग्धार्थ दस्तावेज को स्पष्ट करने या उसका संशोधन करने के साक्ष्य का अपवर्जन -- जबकि किसी दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा देखते ही संदिग्धार्थ या त्रुटिपूर्ण है, तब उन तथ्यों का साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा, जो उनका अर्थ दर्शित या उसकी त्रुटियों की पूर्ति कर दें। दृष्टांत (क) ख को क 1,000 रुपयों या 1,500 रुपयों में एक घोड़ा बेचने का लिखित करार करता है। यह दर्शित करने के लिए कि कौन-सा मूल्य दिया जाना था, साक्ष्य नहीं दिया जा सकता। (ख) किसी विलेख में रिक्त स्थान है। उन तथ्यों का साक्ष्य नहीं
94. विद्यमान तथ्यों को दस्तावेज के लागू होने के विरुद्ध साक्ष्य का अपवर्जन -- जबकि दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा स्वयं स्पष्ट हो और जबकि वह विद्यमान तथ्यों को ठीक-ठीक लागू होती हो, तब यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा कि वह ऐसे तथ्यों को लागू होने के लिए अभिप्रेत नहीं थी। दृष्टांत ख को क “रामपुर में 100 बीघे वाली मेरी सम्पदा” विलेख द्वारा बेचता है। क के पास रामपुर में 100 बीघे वाली एक सम्पदा है। इस तथ्य का साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा कि विक्रयार्थ अभिप्रेत सम्पदा किसी भिन्न स्थान पर
95. विद्यमान तथ्यों के संदर्भ में अर्थहीन दस्तावेज के बारे में साक्ष्य -- जबकि दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा स्वयं स्पष्ट हो, किन्तु विद्यमान तथ्यों के संदर्भ में अर्थहीन हो, तो यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकेगा, कि वह एक विशिष्ट भाव में प्रयुक्त की गई थी। दृष्टांत ख को क “मेरा कलकत्ते का गृह" विलेख द्वारा बेचता है। क का कलकत्ते में कोई गृह नहीं था किन्तु यह प्रतीत होता है कि उसका हावड़ा में एक गृह था जो विलेख के निष्पादन के समय से ख के कब्जे में था। इन तथ्यों को यह दर्शित करने के
96. उस भाषा के लागू होने के बारे में साक्ष्य जो कई व्यक्तियों में से केवल एक को लागू हो सकती है -- जबकि तथ्य ऐसे हैं कि प्रयुक्त भाषा कई व्यक्तियों या चीजों में से किसी एक को लागू होने के लिए अभिप्रेत हो सकती थी तथा एक से अधिक को लागू होने के लिए अभिप्रेत नहीं हो सकती थी, तब उन तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा जो यह दर्शित करते हैं कि उन व्यक्तियों या चीजों में से किसको लागू होने के लिए वह आशयित थी। दृष्टांत (क) क, 1,000 रुपये में “मेरा सफेद घोड़ा' ख को बेचने का करार करता है। क के पास दो सफेद घ
97. तथ्यों के दो संवर्गों में से जिनमें से किसी एक को भी वह भाषा पूरी की पूरी ठीक-ठीक लागू नहीं होती, उसमें से एक को भाषा के लागू होने के बारे में साक्ष्य -- जबकि प्रयुक्त भाषा भागतः विद्यमान तथ्यों के एक संवर्ग को और भागतः विद्यमान तथ्यों के अन्य संवर्ग को लागू होती है, किन्तु वह पूरी की पूरी दोनों में से किसी एक को भी ठीक-ठीक लागू नहीं होती, तब यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकेगा कि वह दोनों में से किसको लागू होने के लिए अभिप्रेत थी। दृष्टांत ख को “मेरी भ में स्थित म के अधिभोग में भू
98. न पढ़ी जा सकने वाली लिपि आदि के अर्थ के बारे में साक्ष्य -- ऐसी लिपि का, जो पढ़ी न जा सके या सामान्यतः समझी न जाती हो, विदेशी, अप्रचलित, पारिभाषिक, स्थानिक और प्रांतीय शब्द प्रयोगों का, संक्षेपाक्षरों का और विशिष्ट भाव में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकेगा। दृष्टांत एक मूर्तिकार, क “मेरी सभी प्रतिमाएँ" ख को बेचने का करार करता है। क के पास प्रतिमान और प्रतिमा बनाने के औजार भी हैं। यह दर्शित कराने के लिए कि वह किसे बेचने का अभिप्राय रखता था, साक्ष्य दिया जा सके
99. दस्तावेज के निबंधनों में फेरफार करने वाले करार का साक्ष्य कौन दे सकेगा -- वे व्यक्ति जो किसी दस्तावेज के पक्षकार या उनके हित प्रतिनिधि नहीं हैं, ऐसे किन्हीं भी तथ्यों का साक्ष्य दे सकेंगे, जो दस्तावेज के निबंधनों में फेरफार करने वाले किसी समकालीन करार को दर्शित करने की प्रवृत्ति रखते हों। दृष्टांत क और ख लिखित संविदा करते हैं कि क को कुछ कपास ख बेचेगा जिसके लिए संदाय कपास के परिदान किए जाने पर किया जाएगा। उसी समय वे एक मौखिक करार करते हैं कि क को तीन मास का प्रत्यय दिया जाएगा। क और ख के बी
100. भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के विल संबंधी उपबंधों की व्यावृत्ति -- इस अध्याय की कोई भी बात विल का अर्थ लगाने के बारे में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (1865 का 10) के किन्हीं भी उपबंधों पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी।
भाग 3 : साक्ष्य का पेश किया जाना और प्रभाव अध्याय 7 : सबूत के भार के विषय में 101. सबूत का भार -- जो कोई न्यायालय से यह चाहता है कि वह ऐसे किसी विधिक अधिकार या दायित्व के बारे में निर्णय दे जो उन तथ्यों के अस्तित्व पर निर्भर है, जिन्हें वह प्राख्यात करता है, उसे साबित करना होगा कि उन तथ्यों का अस्तित्व है। जब कोई व्यक्ति किसी तथ्य का अस्तित्व साबित करने के लिए आबद्ध है, तब यह कहा जाता है कि उस व्यक्ति पर सबूत का भार है। दृष्टांत (क) क न्यायालय से चाहता है कि वह ख को उस अपराध के लिए दण्डित
102. सबूत का भार किस पर होता है -- किसी वाद या कार्यवाही में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो असफल हो जाएगा, यदि दोनों में से किसी भी ओर से कोई भी साक्ष्य न दिया जाए। दृष्टांत (क) ख पर उस भूमि के लिए क वाद लाता है जो ख के कब्जे में है और जिसके बारे में क प्राख्यान करता है कि वह ख के पिता ग की विल द्वारा क के लिए दी गई थी। यदि किसी भी ओर से कोई साक्ष्य नहीं दिया जाए, तो ख इसका हकदार होगा कि वह अपना कब्जा रखे रहे। अतः सबूत का भार क पर है। (ख) ख पर एक बंधपत्र मद्धे शोध्य धन के लिए क
103. विशिष्ट तथ्य के बारे में सबूत का भार -- किसी विशिष्ट तथ्य के सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो न्यायालय से यह चाहता है कि उसके अस्तित्व में विश्वास करे, जब तक कि किसी विधि द्वारा यह न हो कि उस तथ्य के सबूत का भार किसी विशिष्ट व्यक्ति पर होगा। दृष्टांत (क) ख को क चोरी के लिए अभियोजित करता है और न्यायालय से यह चाहता है कि न्यायालय यह विश्वास करे कि ख ने चोरी की स्वीकृति ग से की। क को यह स्वीकृति साबित करनी होगी। (ख) ख न्यायालय से चाहता है कि वह यह विश्वास करे कि प्रश्नगत समय पर वह अन्
104. साक्ष्य को ग्राह्य बनाने के लिए जो तथ्य साबित किया जाना हो, उसे साबित करने का भार -- ऐसे तथ्य को साबित करने का भार जिसका साबित किया जाना किसी व्यक्ति को किसी अन्य तथ्य का साक्ष्य देने को समर्थ करने के लिए आवश्यक है, उस व्यक्ति पर है जो ऐसा साक्ष्य देना चाहता है। दृष्टांत (क) ख द्वारा किए गए मृत्युकालिक कथन को क साबित करना चाहता है। क को ख की मृत्यु साबित करनी होगी। (ख) क किसी खोई हुई दस्तावेज की अन्तर्वस्तु को द्वितीयक साक्ष्य द्वारा साबित करना चाहता है।  क को यह साबित करना होगा कि दस्
105. यह साबित करने का भार कि अभियुक्त का मामला अपवादों के अन्तर्गत आता है -- जबकि कोई व्यक्ति किसी अपराध का अभियुक्त है, तब उन परिस्थितियों के अस्तित्व को साबित करने का भार, जो उस मामले को भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के साधारण अपवादों में से किसी के अन्तर्गत या उसी संहिता के किसी अन्य भाग में, या उस अपराध की परिभाषा करने वाली किसी विधि में, अन्तर्विष्ट किसी विशेष अपवाद या परन्तुक के अन्तर्गत कर देती है, उस व्यक्ति पर है और न्यायालय ऐसी परिस्थितियों के अभाव की उपधारणा करेगा। दृष्टांत (क) हत
106. विशेषतः ज्ञात तथ्य को साबित करने का भार -- जबकि कोई तथ्य विशेषतः किसी व्यक्ति के ज्ञान में है, तब उस तथ्य को साबित करने का भार उस पर है। दृष्टांत (क) जबकि कोई व्यक्ति किसी कार्य को उस आशय से भिन्न किसी आशय से करता है, जिसे उस कार्य का स्वरूप और परिस्थितियाँ इंगित करती हैं, तब उस आशय को साबित करने का भार उस पर है। (ख) क पर रेल से बिना टिकट यात्रा करने का आरोप है। यह साबित करने का भार कि उसके पास टिकट था, उस पर है।
107. उस व्यक्ति की मृत्यु साबित करने का भार जिसका तीस वर्ष के भीतर जीवित होना ज्ञात है -- जबकि प्रश्न यह है कि कोई मनुष्य जीवित है या मर गया है और यह दर्शित किया गया है कि वह तीस वर्ष के भीतर जीवित था, तब यह साबित करने का भार कि वह मर गया है उस व्यक्ति पर है, जो उसे प्रतिज्ञात करता है।
108. यह साबित करने का भार कि वह व्यक्ति, जिसके बारे में सात वर्ष से कुछ सुना नहीं गया है, जीवित है -- परन्तु जबकि प्रश्न यह है कि कोई मनुष्य जीवित है या मर गया है और यह साबित किया गया है कि उसके बारे में सात वर्ष से उन्होंने कुछ नहीं सुना है, जिन्होंने उसके बारे में यदि वह जीवित होता तो स्वाभाविकतया सुना होता, तब यह साबित करने का भार कि वह जीवित है उस व्यक्ति पर चला जाता है, जो उसे प्रतिज्ञात करता है।
109. भागीदारों, भू-स्वामी और अभिधारी, मालिक और अभिकर्ता के मामलों में सबूत का भार -- जबकि प्रश्न यह है कि क्या कोई व्यक्ति भागीदार, भू-स्वामी और अभिधारी या मालिक और अभिकर्ता है, और यह दर्शित कर दिया गया है कि वे इस रूप में कार्य करते रहे हैं, तब यह साबित करने का भार कि क्रमशः इन संबंधों में वे परस्पर अवस्थित नहीं हैं या अवस्थित होने से परिविरत हो चुके हैं, उस व्यक्ति पर है, जो उसे प्रतिज्ञात करता है।
110. स्वामित्व के बारे में सबूत का भार -- जबकि प्रश्न यह है कि क्या कोई व्यक्ति ऐसी किसी चीज का स्वामी है, जिस पर उसका कब्जा होना दर्शित किया गया है, तब यह साबित करने का भार कि वह स्वामी नहीं है, उस व्यक्ति पर है, जो प्रतिज्ञात करता है कि वह स्वामी नहीं है।
111. उन संव्यवहारों में सद्भाव का साबित किया जाना जिनमें एक पक्षकार का संबंध सक्रिय विश्वास का है -- जहां कि उन पक्षकारों के बीच के संव्यवहार के सदभाव के बारे में प्रश्न है, जिनमें से एक-दूसरे के प्रति सक्रिय विश्वास की स्थिति में हैं, वहां उस संव्यवहार के सद्भाव को साबित करने का भार उस पक्षकार पर है जो सक्रिय विश्वास की स्थिति में है। दृष्टांत (क) कक्षीकार द्वारा अटर्नी के पक्ष में किये गए विक्रय का सद्भाव कक्षीकार द्वारा लाए गए वाद में प्रश्नगत है। का संव्यवहार का सद्भाव साबित करने का भार अट
111-क. कुछ अपराधों के बारे में उपधारणा -- (1) जहां कोई व्यक्ति उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट ऐसे किसी अपराध के-- (क) ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसे उपद्रव को दबाने के लिए और लोक व्यवस्था की बहाली और उसे बनाए रखने के लिए उपबंध करने वाली तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियमिति के अधीन विक्षुब्ध क्षेत्र घोषित किया गया है; या (ख) ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसमें एक मास से अधिक की अवधि के लिए लोक शांति में व्यापक विघ्न रहा है, किए जाने का अभियुक्त है और यह दर्शित किया जाता है कि ऐसा व्यक्ति ऐसे क्षेत्र में किस
112. विवाहित स्थिति के दौरान में जन्म होना धर्मजत्व का निश्चायक सबूत है -- यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का जन्म उसकी माता और किसी पुरुष के बीच विधिमान्य विवाह के कायम रहते हुए, या उसका विघटन होने के उपरान्त माता के अविवाहित रहते हुए दो सौ अस्सी दिन के भीतर हुआ था, इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि वह उस पुरुष का धर्मज पुत्र है, जब तक कि यह दर्शित न किया जा सके कि विवाह के पक्षकारों की परस्पर पहुंच ऐसे किसी समय नहीं थी जब उसका गर्भाधान किया जा सकता था।
113. राज्यक्षेत्र के अध्यर्पण का सबूत -- शासकीय राजपत्र में यह अधिसूचना कि ब्रिटिश राज्यक्षेत्र का कोई भाग किसी भारतीय राज्य, राजा या शासक को गवर्नमेन्ट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 (26 ज. 5, अ. 2) के भाग 3 के प्रारंभ से पूर्व अभ्यर्पित किया गया है, इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि ऐसे राज्यक्षेत्र का ऐसी अधिसूचना में वर्णित तारीख को विधिमान्य अध्यर्पण हआ।
113-क. किसी विवाहित स्त्री द्वारा आत्महत्या के दुष्प्रेरण के बारे में उपधारणा -- जब प्रश्न यह है कि किसी स्त्री द्वारा आत्महत्या का करना उसके पति या उसके पति के किसी नातेदार द्वारा दुष्प्रेरित किया गया है और यह दर्शित किया गया है कि उसने अपने विवाह की तारीख से सात वर्ष की अवधि के भीतर आत्महत्या की थी और यह कि उसके पति या उसके पति के ऐसे नातेदार ने उसके प्रति क्रूरता की थी, तो न्यायालय मामले की सभी अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह उपधारणा कर सकेगा कि ऐसी आत्महत्या उसके पति या उसके पति क
113-ख. दहेज मृत्यु के बारे में उपधारणा-- जब प्रश्न यह है कि किसी व्यक्ति ने किसी स्त्री की दहेज मृत्यु की है और यह दर्शित किया जाता है कि मृत्यु के कुछ पूर्व ऐसे व्यक्ति ने दहेज की किसी मांग के लिए या उसके संबंध में उस स्त्री केसाथ क्रूरता की थी या उसको तंग किया था, तो न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि ऐसे व्यक्ति ने दहेज मृत्यु कारित की थी। स्पष्टीकरण -- इस धारा के प्रयोजनों के लिए "दहेज मृत्यु” का वही अर्थ है, जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 304-ख में है।
114. न्यायालय किन्हीं तथ्यों का अस्तित्व उपधारित कर सकेगा -- न्यायालय ऐसे किसी तथ्य का अस्तित्व उपधारित कर सकेगा जिसका घटित होना उस विशिष्ट मामले के तथ्यों के संबंध में प्राकृतिक घटनाओं, मानवीय आचरण तथा लोक और प्राइवेट कारबार के सामान्य अनुक्रम को ध्यान में रखते हुए वह संभाव्य समझता है। दृष्टांत न्यायालय उपधारित कर सकेगा :- (क) कि चुराए हुए माल पर जिस मनुष्य का चोरी के शीघ्र उपरान्त कब्जा है, जब तक कि वह अपने कब्जे का कारण न बता सके, या तो वह चोर है या उसने माल को चुराया हुआ
114-क. बलात्संग के लिए कतिपय अभियोजन में सम्मति के न होने के बारे में उपधारणा -- भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 376 की उपधारा (2) के खण्ड (क), खण्ड (ख), खण्ड (ग), खण्ड (घ), खण्ड (ङ), खण्ड (च), खण्ड (छ), खण्ड (ज), खण्ड (झ), खण्ड (ब), खण्ड (ट), खण्ड (ठ), खण्ड (ड) या खण्ड (ढ) के अधीन बलात्संग के किसी अभियोजन में, जहां अभियुक्त द्वारा मैथुन किया जाना साबित हो जाता है और प्रश्न यह है कि क्या वह उस स्त्री की, जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उससे बलात्संग किया गया है, सम्मति के ब
114 ख.   भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख के अधीन कारित अपराधों के संबंध में उपधारणा– जब प्रश्न यह है कि क्या भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख के अंतर्गत किसी व्यक्ति ने अपराध कारित किया है और यदि पीड़ित, न्यायालय के समक्ष यह कथन करती है कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ या उसकी लज्जा भंग हुई अथवा उसके कपड़े उतारे गए अथवा उसका पीछा किया गया
115. विबंध -- जबकि एक व्यक्ति ने अपनी घोषणा, कार्य या लोप द्वारा अन्य व्यक्ति को विश्वास साशय कराया है या कर लेने दिया है कि कोई बात सत्य है और ऐसे विश्वास पर कार्य कराया या करने दिया है, तब न तो उसे और न उसके प्रतिनिधि को अपने और ऐसे व्यक्ति के, या उसके प्रतिनिधि के, बीच किसी वाद या कार्यवाही में उस बात की सत्यता का प्रत्याख्यान करने दिया जाएगा। दृष्टांत क साशय और मिथ्या रूप से ख को यह विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है कि अमुक भूमि क की है, और तद्द्वारा ख को उसे क्रय करने और उसका मूल्य चुका
116. अभिधारी का और कब्जाधारी व्यक्ति के अनुज्ञप्तिधारी का विबंध -- स्थावर संपत्ति के किसी भी अभिधारी को या ऐसे अभिधारी से व्युत्पन्न अधिकार से दावा करने वाले व्यक्ति को ऐसी अभिधृति के चालू रहते हुए, इसका प्रत्याख्यान न करने दिया जाएगा कि ऐसे अभिधारी के भूस्वामी का ऐसी स्थावर संपत्ति पर, उस अभिधृति के आरंभ पर हक था तथा किसी भी व्यक्ति को, जो किसी स्थावर संपत्ति पर उस पर कब्जाधारी व्यक्ति की अनुज्ञप्ति द्वारा आया है, इसका प्रत्याख्यान न करने दिया जाएगा, कि ऐसे व्यक्ति को उस समय, जब ऐसी अनुज्ञप्ति
117. विनिमय-पत्र के प्रतिगृहीता का, उपनिहिती का या अनुज्ञप्तिधारी का विबंध -- किसी विनिमय-पत्र के प्रतिगृहीता को इसका प्रत्याख्यान करने की अनुज्ञा न दी जाएगी कि लेखीवाल को ऐसा विनिमय-पत्र लिखने या उसे पृष्ठांकित करने का प्राधिकार था, और न किसी उपनिहिती या अनुज्ञप्तिधारी को इसका प्रत्याख्यान करने दिया जाएगा कि उपनिधाता या अनुज्ञापक को उस समय, जब ऐसा उपनिधान या अनुज्ञप्ति आरंभ हुई, ऐसे उपनिधान करने या अनुज्ञप्ति अनुदान करने का प्राधिकार था। स्पष्टीकरण 1-- किसी विनिमय-पत्र का प्रतिगृहीता इसका प्
"क" "ख" की मृत्यु कारित करता है। बचाव में "क" द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि मृत्यु कारित करते समय वह नशे के कारण कार्य की प्रकृति व उसके परिणामों को समझ पाने में असमर्थ था। क्या "क" हत्या का दोषी माना जाएगा?              जी हां "क" को हत्या का दोषी माना जाएगा। भारतीय दंड संहिता की धारा 85 के अनुसार कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, को उसे करते समय मत्तता के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने म
118. कौन साक्ष्य दे सकेगा -- सभी व्यक्ति साक्ष्य देने के लिए सक्षम होंगे जब तक कि न्यायालय का यह विचार न हो कि कोमल वयस, अतिवार्धक्य, शरीर के या मन के रोग या इसी प्रकार के किसी अन्य कारण से वे उनसे किए गए प्रश्नों को समझने से या उन प्रश्नों के युक्तिसंगत उत्तर देने से निवारित हैं। स्पष्टीकरण -- कोई पागल व्यक्ति साक्ष्य देने के लिए अक्षम नहीं है, जब तक कि वह अपने पागलपन के कारण उससे किए गए प्रश्नों को समझने से या उनके युक्तिसंगत उत्तर देने से निवारित न हो।
119. साक्षी का मौखिक रूप से संसूचित करने में असमर्थ होना -- ऐसा कोई साक्षी, जो बोलने में असमर्थ है, ऐसी किसी अन्य रीति में, जिससे वह उसे बोधगम्य बना सकता है जैसे कि लिखकर या संकेत चिह्नों द्वारा, अपना साक्ष्य दे सकेगा; किन्तु ऐसा लेखन लिखित रूप में होना चाहिए और खुले न्यायालय में प्रकट संकेत चिह्न तथा इस प्रकार दिया गया साक्ष्य मौखिक साक्ष्य माना जाएगा : परन्तु यदि साक्षी मौखिक रूप से संसूचित करने में असमर्थ है तो न्यायालय कथन अभिलिखित करने में किसी द्विभाषिए या विशेष प्रबोधक की सहायता लेगा औ
120. सिविल वाद के पक्षकार और उनकी पत्नियाँ या पति, दाण्डिक विचारण के अधीन व्यक्ति का पति या पत्नी -- सभी सिविल कार्यवाहियों में वाद के पक्षकार और वाद के किसी पक्षकार का पति या पत्नी सक्षम साक्षी होंगे। किसी व्यक्ति के विरुद्ध दाण्डिक कार्यवाही में उस व्यक्ति का पति या पत्नी सक्षम साक्षी होगा या होगी।
121. न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट -- कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट न्यायालय में ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के नाते अपने स्वयं के आचरण के बारे में, या ऐसी किसी बात के बारे में, जिसका ज्ञान उसे ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के नाते न्यायालय में हुआ, किन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ऐसे किसी भी न्यायालय के विशेष आदेश के सिवाय, जिसके वह अधीनस्थ है, विवश नहीं किया जाएगा, किन्तु अन्य बातों के बारे में जो उसकी उपस्थिति में उस समय घटित हुई थी, जब वह ऐसे कार्य कर रहा था, उसकी परीक्षा की जा सकेगी। दृष्टा
122. विवाहित स्थिति के दौरान में की गई संसूचनाएं -- कोई भी व्यक्ति, जो विवाहित है या जो विवाहित रह चुका है, किसी संसूचना को, जो किसी व्यक्ति द्वारा, जिससे वह विवाहित है या रह चुका है, विवाहित स्थिति के दौरान में उसे दी गई थी प्रकट करने के लिए विवश न किया जाएगा, और न वह किसी ऐसी संसूचना को प्रकट करने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा, जब तक वह व्यक्ति, जिसने वह संसूचना दी है या उसका हित प्रतिनिधि सम्मत न हो, सिवाय उन वादों में, जो विवाहित व्यक्तियों के बीच हों, या उन कार्यवाहियों में, जिनमें एक विवाहित
123. राज्य के कार्यकलापों के बारे में साक्ष्य -- कोई भी व्यक्ति राज्य के किसी भी कार्यकलापों से संबंधित अप्रकाशित शासकीय अभिलेखों से व्युत्पन्न कोई भी साक्ष्य देने के लिए अनुज्ञात न किया जाएगा, सिवाय सम्पृक्त विभाग के प्रमुख ऑफिसर की अनुज्ञा के जो ऐसी अनुज्ञा देगा या उसे विधारित करेगा, जैसा करना वह ठीक समझे।
124. शासकीय संसूचनाएं -- कोई भी लोक ऑफिसर उसे शासकीय विश्वास में दी हुई संसूचनाओं को प्रकट करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, जब कि वह समझता है कि उस प्रकटन से लोक हित की हानि होगी।
125. अपराधों के करने के बारे में जानकारी -- कोई भी मजिस्ट्रेट या पुलिस ऑफिसर यह कहने के लिए विवश नहीं किया जाएगा कि किसी अपराध के किए जाने के बारे में उसे कोई जानकारी कहां से मिली और किसी भी राजस्व ऑफिसर को यह कहने के लिए विवश नहीं किया जाएगा कि उसे लोकराजस्व के विरुद्ध किसी अपराध के किए जाने के बारे में कोई जानकारी कहां से मिली। स्पष्टीकरण -- इस धारा मे “राजस्व ऑफिसर" से लोक राजस्व की किसी शाखा के कारबार में या के बारे में नियोजित ऑफिसर अभिप्रेत है।
126. वृत्तिक संसूचनाएं -- कोई भी बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील अपने कक्षीकार की अभिव्यक्त सम्मति के सिवाय ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने के लिए, जो उसके ऐसे बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील की हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ उसके कक्षीकार द्वारा, या की ओर से उसे दी गई हो अथवा किसी दस्तावेज की, जिससे वह अपने वृत्तिक नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ परिचित हो गया है, अन्तर्वस्तु या दशा कथित करने को अथवा किसी सलाह को, जो ऐसे नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ
127. धारा 126 दुभाषियों आदि को लागू होगी -- धारा 126 के उपबंध दुभाषियों और बैरिस्टरों, प्लीडरों, अटर्नियों और वकीलों के लिपिकों या सेवकों को लागू होंगे।
128. साक्ष्य देने के लिए स्वयमेव उद्यत होने से विशेषाधिकार अधित्यक्त नहीं हो जाता -- यदि किसी वाद का कोई पक्षकार स्वप्रेरणा से ही या अन्यथा उसमें साक्ष्य देता है तो यह न समझा जाएगा कि तद्द्वारा उसने ऐसे प्रकटन के लिए, जैसा धारा 126 में वर्णित है, सम्मति दे दी है, तथा यदि किसी वाद या कार्यवाही का कोई पक्षकार ऐसे किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील को साक्षी के रूप में बुलाता है, तो यह कि उसने ऐसे प्रकटन के लिए अपनी सम्मति दे दी है केवल तभी समझा जाएगा, जबकि वह ऐसे बैरिस्टर, अटर्नी या वकील से उन
129. विधि सलाहकारों से गोपनीय संसूचनाएं -- कोई भी व्यक्ति किसी गोपनीय संसूचना को, जो उसके और उसके विधि वृत्तिक सलाहकार के बीच हुई है, न्यायालय को प्रकट करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह अपने को साक्षी के तौर पर पेश न कर दे, ऐसे पेश करने की दशा में किन्हीं भी ऐसी संसूचनाओं को, जिन्हें उस किसी साक्ष्य को स्पष्ट करने के लिए जानना, जो उसने दिया है, न्यायालय को आवश्यक प्रतीत हो, प्रकट करने के लिए विवश किया जा सकेगा, किन्तु किन्हीं भी अन्य संसूचनाओं को नहीं।
130. जो साक्षी पक्षकार नहीं है उसके हक-विलेखों का पेश किया जाना -- कोई भी साक्षी, जो वाद का पक्षकार नहीं है, किसी संपत्ति संबंधी अपने हक विलेखों को, या किसी ऐसी दस्तावेज को, जिसके बल पर वह गिरवीदार या बंधकदार के रूप में कोई संपत्ति धारण करता है, या किसी दस्तावेज को, जिसका पेशकरण उसे अपराध में फंसाने की प्रवृत्ति रखता है, पेश करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, जब तक कि उसने ऐसे विलेखों के पेशकरण की ईप्सा रखने वाले व्यक्ति के साथ, या ऐसे किसी व्यक्ति के साथ जिससे व्युत्पन्न अधिकार से यह व्यक्ति दाव
131. ऐसे दस्तावेजों या इलेक्ट्रानिक अभिलेखों का पेश किया जाना, जिन्हें कोई दूसरा व्यक्ति, जिसका उन पर कब्जा है, पेश करने से इंकार कर सकता था -- कोई भी व्यक्ति, अपने कब्जे में की ऐसे दस्तावेजों या अपने नियंत्रण वाले इलेक्ट्रानिक अभिलेखों को पेश करने के लिए, जिनको पेश करने के लिए कोई ना अन्य व्यक्ति, यदि वे उसके कब्जे या नियंत्रण में होते, पेश करने से इंकार करने का हकदार होता, विवश नहीं किया जाएगा, जब तक कि ऐसा अंतिम वर्णित व्यक्ति उन्हें पेश करने के लिए सहमति नहीं देता।
132. इस आधार पर कि उत्तर उसे अपराध में फंसाएगा, साक्षी उत्तर देने से क्षम्य न होगा -- कोई साक्षी किसी वाद या किसी सिविल या दाण्डिक कार्यवाही में विवाद्यक विषय से सुसंगत किसी विषय के बारे में किए गए किसी प्रश्न का उत्तर देने से इस आधार पर क्षम्य नहीं होगा कि ऐसे प्रश्न का उत्तर ऐसे साक्षी को अपराध में फंसाएगा या उसकी प्रवृत्ति प्रत्यक्षतः या परोक्षतः अपराध में फंसाने की होगी अथवा वह ऐसे साक्षी को किसी किस्म की शास्ति या समपहरण के लिए उच्छन्न करेगा या इसकी प्रवृत्ति प्रत्यक्षतः या परोक्षतः उच्छन्न
प्रारम्भिक (PRELIMINARY)
प्रारम्भिक (PRELIMINARY)
आयुधों और गोलाबारूद से सम्बन्धित विधि का समेकन और संशोधन करने के लिए अधिनियम भारत गणराज्य के दसवें वर्ष में संसद्‌ द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :--
आयुधों और गोलाबारूद से सम्बन्धित विधि का समेकन और संशोधन करने के लिए अधिनियम
(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो. (1) In this Act, unless the context otherwise requires,―
(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो. (1) In this Act, unless the context otherwise requires,―

2. परिभाषाएं और निर्वचन -
इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो.
4. कतिपय दशाओं में विनिर्दिष्ट वर्णन के आयुधों के अर्जन और कब्जे के लिए अनुज्ञप्ति -
35. परिसरों के अधिभोगी व्यक्तियों का कतिपय दशाओं में आपराधिक उत्तरदायित्व -
अनुशासनिक मामलों में प्रस्तावित दंडों पर बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्श करने के संबंध में।
37. गिरफ्तारी और तलाशी -(Arrest and search)
7. प्रतिषिद्ध आयुधों या प्रतिषिद्ध गोलाबारूद के अर्जन या कब्जे में रखने या उसके विनिर्माण या विक्रय का प्रतिषेध -
23. आयुध आदि के लिए जलयानों, यानों आदि की तलाशी -
9. तरुण व्यक्तियों और कुछ अन्य व्यक्तियों द्वारा अग्न्यायुधों आदि के अर्जन या कब्जे का या उनके विक्रय या अन्तरण का प्रतिषेध -
41. छूट देने की शक्ति -(Power to exempt.)
12. आयुधों का परिवहन निर्बन्धित या प्रतिषिद्ध करने की शक्ति -

432. लोक जल निकास में नुकसानप्रद जलप्लावन या बाधा कारित करने द्वारा रिष्टि -
363 क. भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए अप्राप्तवय का व्यपहरण या विकलांगीकरण -
धारा 354, 354क, 354, 3547, 354घ के अंतर्गत अपराध कारित होने से रोकने में विफल रहने वाले व्यक्ति का दायित्व – जो कोई, धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग या धारा 354घ का अपराध कारित होते समय उपस्थित रहता है और ऐसे अपराध को कारित होने से रोकने की स्थिति में होते हुए भी ऐसे अपराध को कारित होने से रोकने में विफल रहता है या यदि वह अपराध को कारित होने से रोकने की स्थिति में नहीं है तो अपराधी को वैध दण्ड से बचाने के आशय से ऐसे किसी अपराध के कारित होने की सूचना किसी भी तरीके से निकटस्थ मजि
गंभीर प्रकोपन होने से अन्यथा किसी व्यक्ति का अनादर करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग – जो कोई किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग उस व्यक्ति द्वारा गंभीर और अचानक प्रकोपन दिए जाने पर करने से अन्यथा, इस आशय से करेगा कि तद्द्वारा उसका अनादर किया जाए, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना – जो कोई, किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए, ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “क्रूरता” से निम्नलिखित अभिप्रेत है:- (क) जानबूझकर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकृति का है जिससे उस स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने की या उस स्त्री के जीवन, अंग या स्वास्थ्
मत्त व्यक्ति द्वारा लोक स्थान में अवचार – जो कोई मत्तता की हालत में किसी लोक स्थान में, या किसी ऐसे स्थान में, जिसमें उसका प्रवेश करना अतिचार हो, आएगा और वहाँ इस प्रकार का आचरण करेगा जिससे किसी व्यक्ति को क्षोभ हो,