90. तीस वर्ष पुरानी दस्तावेजों के बारे में उपधारणा

Author: | Date: 2022-12-05 19:36:51

90. तीस वर्ष पुरानी दस्तावेजों के बारे में उपधारणा -- जहां कि कोई दस्तावेज, जिसका तीस वर्ष पुरानी होना तात्पर्यित है या साबित किया गया है, ऐसी किसी अभिरक्षा में से, जिसे न्यायालय उस विशिष्ट मामले में उचित समझता है, पेश की गई है, वहां न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर और उसका हर अन्य भाग, जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तलेख में होना तात्पर्यित है, उस व्यक्ति के हस्तलेख में है, और निष्पादित या अनुप्रमाणित दस्तावेज होने की दशा में यह उपधारित कर सकेगा कि वह उन व्यक्तियों द्वारा सम्यक् रूप से निष्पादित और अनुप्रमाणित की गई थी जिनके द्वारा उसका निष्पादित और अनुप्रमाणित होना तात्पर्यित है। स्पष्टीकरण -- दस्तावेजों का उचित अभिरक्षा में होना कहा जाता है, यदि वे ऐसे स्थान में और उस व्यक्ति की देख-रेख में है, जहां और जिसके पास वे प्रकृत्या होनी चाहिए, किन्तु कोई भी अभिरक्षा अनुचित नहीं है, यदि यह साबित कर दिया जाए कि अभिरक्षा का उद्गम विधिसम्मत था या यदि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियां ऐसी हों, जिनसे ऐसा उद्गम अधिसंभाव्य हो जाता है।

दृष्टांत

(क) क भू-संपत्ति पर दीर्घकाल से कब्जा रखता आया है। वह उस भूमि संबंधी विलेख, जिनसे उस भूमि पर उसका हक दर्शित होता है, अपनी अभिरक्षा में से पेश करता है। यह अभिरक्षा उचित है। (ख) क उस भू-संपत्ति से संबद्ध विलेख, जिसका वह बंधकदार है, पेश करता है। बंधककर्ता संपत्ति पर कब्जा रखता है। यह अभिरक्षा उचित है। (ग) ख का संसंगी क, ख के कब्जे वाली भूमि से संबंधित विलेख पेश करता है, जिन्हें ख ने उसके पास सुरक्षित अभिरक्षा के लिए निक्षिप्त किया था। यह अभिरक्षा उचित है। ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------

राज्य संशोधन

उत्तरप्रदेश -- विद्यमान धारा, धारा 90(1) के रूप में पुनर्संख्यांकित की जाएगी, और (क) शब्द “तीस वर्ष के स्थान पर “बीस वर्ष” प्रतिस्थापित किए जाएंगे, और (ख) अग्रलिखित को नई धारा (2) के रूप में जोड़ा जावेगा, अर्थात् :- “(2) जब कोई दस्तावेज जो उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट है, को दस्तावेज के पंजीयन संबंधी विधि न के अनुसार पंजीकृत किया गया था और सम्यक् रूप से प्रमाणित उसकी प्रति प्रस्तुत की गई है तो न्यायालय उपधारणा कर सकेगा कि ऐसे दस्तावेज के हस्ताक्षर तथा उसका अन्य प्रत्येक भाग जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति का होना तात्पर्यित है उस व्यक्ति के हस्तलेख में है और उस व्यक्ति द्वारा अनुप्रमाणित है जिसके द्वारा उसका निष्पादित या अनुप्रमाणित होना तात्पर्यित है।" धारा 90 के पश्चात् धारा 90-क अंतःस्थापित की जावेगी, अर्थात् :- “90-क. (1) जब कोई पंजीकृत दस्तावेज या उसकी विधिवत अनुप्रमाणित प्रति या दस्तावेज की कोई अनुप्रमाणित प्रति जो कि न्यायालय के रेकार्ड का भाग है किसी की अभिरक्षा में से प्रस्तुत की जाती है जिसे न्यायालय किसी विशेष मामले में उचित समझता है तो न्यायालय यह उपधारणा कर सकेगा कि मूल दस्तावेज उस व्यक्ति द्वारा निष्पादित किया गया था जिसके द्वारा उसका निष्पादित किया जाना तात्पर्यित है। (2) कोई दस्तावेज जो किसी वाद का या प्रतिरक्षा का आधार है या वादपत्र में या लिखित कथन में जिस पर विश्वास किया गया है, के बाबत् उक्त उपधारणा नहीं की जाएगी।” धारा 90 की उपधारा (1) में दिया गया स्पष्टीकरण इस धारा को भी लागू होगा। [यू.पी. एक्ट संख्या 24 सन् 1954, धारा 2 (दिनांक 30-11-1954 से प्रभावशील)।]