प्राथमिकी में सच्चाई है तो आरोपी को सजा मिलना तय है!

Author: | Date: 2022-11-15 17:42:41

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प्राथमिकी में सच्चाई है तो आरोपी को सजा मिलना तय है!
गोपालगंज: 4.11.2022
प्राथमिकी में सच्चाई है, न्यायालय में न्याय मिलने में देर भले ही लग सकती है लेकिन जीत हमेशा सत्य की होती है. ताजा मामला गोपालगंज जिले के फुलवरिया थाना से संबंधित फुलवरिया थाना कांड संख्या 167/2009 बिहार सरकार बनाम रामसेवक सिंह एवं अन्य का है। 2009 संकेसिया देवी द्वारा फुलवरिया थाने में दिनांक 7/11/2009 को प्राथमिकी दर्ज करायी गई थी जिसमें उनके पाटीदार रामसेवक सिंह, धनंजय सिंह एवं अन्य को अभियुक्त बनाया गया था। न्यायालय ने बहुत ही साधारण धाराओं के अंतर्गत संज्ञान लिया और सुनवाई के बाद दिनांक 4 नवंबर 2022 को श्री मुकेश कुमार माननीय न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी गोपालगंज ने अभियुक्तों को दोषी पाते हुए धारा 341/323 के अंतर्गत रामसेवक सिंह एवं धनंजय सिंह सजा सुनाई।
अक्सर यह देखा जाता है कि लोगों द्वारा FIR करते समय तरह-तरह की झूठी बातों का समावेश कर प्राथमिकी को भारी-भरकम बनाने की कोशिश की जाती है जिसका नतीजा यह होता है कि अधिकतर धाराएं वरीय पदाधिकारी के पर्यवेक्षण के दौरान हटा दी जाती है और बाकी बची धाराएं न्यायालय में जाते-जाते साक्ष्य के अभाव में सिद्ध नहीं हो पाते।
f.i.r. करते समय हर व्यक्ति को यह ध्यान में रखना चाहिए कि उनके साथ जो भी घटनाएं घटी है, उन्हीं बातों का समावेश करें, अन्य बातों को समावेश करने से उसकी सत्यता साबित करने में वादी को परेशानी होती है। बात जितना सत्य के करीब होता है उसे साबित करना उतना ही आसान होता है। यदि आपके पास पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो यह कोई मायने नहीं रखता कि कोई स्वतंत्र साक्षी है या नहीं। (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम नरेश व अन्य) यहां जिन दो धाराओं में अभियुक्त को दोषी पाया गया है वह आईपीसी की सबसे साधारण धारा है। आइए देखते हैं वह धाराएं क्या कहती है-
  1. स्वेच्छया उपहति कारित करने के लिए दण्ड उस दशा के सिवाय, जिसके लिए धारा 334 में उपबंध है, जो कोई स्वेच्छया उपहति कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
कोई भी व्यक्ति जब किसी अन्य व्यक्ति को जानबूझकर चोट पहुंचाता है तब उसे स्वेच्छाया उपहति कारित करना कहा जाता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 323 में चोट को साबित करने के लिए जख्म प्रतिवेदन को अनिवार्य शर्त नहीं माना है। (लक्ष्मण सिंह बनाम बिहार राज्य [सीआरए 606/ 2021 ] चोट" को धारा 319 आईपीसी के तहत परिभाषित किया गया है। धारा 319 आईपीसी के अनुसार, जो कोई भी शारीरिक दर्द, बीमारी या किसी व्यक्ति को दुर्बल बनाता है, उसे "चोट" कहा जाता है। इसलिए, शारीरिक दर्द को भी "चोट" कहा जा सकता है।
147. बल्वा करने के लिए दण्ड- जो कोई बल्वा करने का दोषी होगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
बल्वा की परिभाषा आईपीसी की धारा 146 में दी गई है जो इस प्रकार है-
बल्वा करना-जब कभी विधिविरुद्ध जमाव द्वारा या उसके किसी सदस्य द्वारा, ऐसे जमाव के सामान्य उद्देश्य को अग्रसर करने में बल या हिंसा का प्रयोग किया जाता है, तब ऐसे जमाव का हर सदस्य बल्वा करने के अपराध का दोषी होगा।
judgement देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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