114-क. बलात्संग के लिए कतिपय अभियोजन में सम्मति के न होने के बारे में उपधारणा

Author: | Date: 2022-12-05 21:17:45

114-क. बलात्संग के लिए कतिपय अभियोजन में सम्मति के  होने के बारे में उपधारणा -- भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 376 की उपधारा (2) के खण्ड (क), खण्ड (ख), खण्ड (ग), खण्ड (घ), खण्ड (ङ), खण्ड (च), खण्ड (छ), खण्ड (ज), खण्ड (झ), खण्ड (ब), खण्ड (ट), खण्ड (ठ), खण्ड (ड) या खण्ड (ढ) के अधीन बलात्संग के किसी अभियोजन में, जहां अभियुक्त द्वारा मैथुन किया जाना साबित हो जाता है और प्रश्न यह है कि क्या वह उस स्त्री की, जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उससे बलात्संग किया गया है, सम्मति के बिना किया गया और ऐसी स्त्री अपने साक्ष्य में न्यायालय के समक्ष यह कथन करती है कि उसने सम्मति नहीं दी थी, वहां न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि उसने सम्मति नहीं दी थी।
स्पष्टीकरण -- इस धारा में “मैथुन" से भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 375 के खण्ड (क) से खण्ड (घ) में वर्णित कोई कार्य अभिप्रेत होगा। ------------------------------------------------------------------------------------------------

राज्य संशोधन

छत्तीसगढ़ -- धारा 114क के पश्चात्, निम्नलिखित अंत:स्थापित किया जाए, अर्थात् :- "114ख. भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख के अधीन कारित अपराधों के संबंध में उपधारणा -- जब प्रश्न यह है कि क्या भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख के अंतर्गत किसी व्यक्ति ने अपराध कारित किया है और यदि पीड़ित, न्यायालय के समक्ष यह कथन करती है कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ या उसकी लज्जाभंग हुई अथवा उसके कपड़े उतारे गए अथवा उसका पीछा किया गया या उसकी निजता में हस्तक्षेप किया गया अथवा वह किन्हीं साधनों द्वारा यौन उत्पीड़ित की गई, यथास्थिति, वहां न्यायालय, जब तक कि विपरीत साबित न हो, तब तक यह उपधारणा कर सकेगा कि ऐसा अपराध उस व्यक्ति द्वारा कारित किया गया है।" [देखें दण्ड विधि (छ.ग. संशोधन) अधिनियम, 2013 (25 सन् 2015), धारा 14 (दि. 21-7-2015 से प्रभावशील)। छ.ग. राजपत्र (असा.) दि. 21-7-2015 पृष्ठ 777-778(9) पर प्रकाशित ।]