पटना हाईकोर्ट ने एक अक्टूबर 2026 को सुनाए एक मौखिक निर्णय में भोजपुर जिले के पीरो थाना कांड संख्या 244/2018 में मजिस्ट्रेट द्वारा लिए गए संज्ञान को तीन आरोपियों के विरुद्ध रद्द कर दिया। मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 366(क) यानी नाबालिग लड़की की प्रोक्यूरेशन का था। पुलिस ने जाँच के बाद इन तीनों को ट्रायल के लिए भेजा ही नहीं था और फाइनल फॉर्म दाखिल कर दिया था, मगर अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने पुलिस की राय से अलग मत रखते हुए इनके खिलाफ संज्ञान ले लिया। यह निर्णय न्यायमूर्ति चंद्र शेखर झा की एकल पीठ का है। मामला इंदु देवी बनाम बिहार राज्य (Cr. Misc. No. 21262 of 2019) के नाम से दर्ज है और निर्णय को AFR यानी रिपोर्टिंग योग्य घोषित किया गया है।
कांड की पृष्ठभूमि
अभियोजन के अनुसार सूचक की लगभग पंद्रह साल की बेटी लहराबाद के सरकारी विद्यालय में दसवीं की छात्रा थी। 11 जुलाई 2018 को सुबह करीब छह बजे वह ओसवालिया मोड़ के पास आदर्श कोचिंग सेंटर पढ़ने गई, लेकिन देर शाम तक घर नहीं लौटी। परिवार ने इधर-उधर खोज की और बाद में उन्हें सूचना मिली कि अमित कुमार नाम का युवक शादी का झाँसा देकर उसे ले गया है। सूचक का कहना था कि जब वह अमित के घर पहुँचा तो उसके माता-पिता और चचेरे भाई ने धमकाकर उसे वहाँ से भगा दिया। समाज में बदनामी के डर से उसने तत्काल थाने में शिकायत नहीं की और बेटी को खुद ही ढूँढता रहा। आखिरकार 19 जुलाई 2018 को लिखित रिपोर्ट दी गई, यानी घटना के सात दिन बाद, और उसी पर पीरो थाना कांड संख्या 244/2018 दर्ज हुआ।
पुलिस ने अनुसंधान किया और 23 सितंबर 2018 को फाइनल फॉर्म संख्या 197/18 दाखिल किया, जिसमें अमित कुमार के माता-पिता और मामा को ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया। इसी बीच पीड़िता का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुआ। उसमें उसने कहा कि पढ़ाई को लेकर माता-पिता की डाँट से नाराज़ होकर वह अपनी मर्ज़ी से घर छोड़कर गई थी। उसने न अपहरण की बात मानी और न ही इन तीनों में से किसी पर कोई आरोप लगाया। इसके बावजूद 18 दिसंबर 2018 को अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-I, आरा ने पुलिस रिपोर्ट से भिन्न राय रखते हुए धारा 366(क) आईपीसी में संज्ञान ले लिया। इसी आदेश को चुनौती देने के लिए अमित के माता-पिता इंदु देवी और अवध नारायण सिंह उर्फ़ हरिद्वार सिंह तथा मामा अमन कुमार धारा 482 सीआरपीसी के तहत हाईकोर्ट पहुँचे। मुख्य आरोपी अमित कुमार इस याचिका में पक्षकार नहीं था।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता का कहना था कि मजिस्ट्रेट के आदेश में ऐसा कोई कानूनी आधार नहीं बताया गया है जिससे यह समझ आए कि उन्होंने जाँच एजेंसी के निष्कर्ष से असहमति क्यों जताई। उनका तर्क था कि घटना और एफआईआर के बीच सात दिन का अंतर है, पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को चार्जशीट में नहीं रखा और सबसे बड़ी बात, जिस लड़की के कथित अपहरण का मामला है, उसी ने मजिस्ट्रेट के सामने इसका समर्थन नहीं किया। ऐसे में कार्यवाही जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। उन्होंने पटना हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ के पुराने निर्णय कृष्णा महतो उर्फ़ कृष्ण कुमार महतो बनाम बिहार राज्य (Cr. Misc. 48023/2013, निर्णय 11.05.2017) का हवाला भी दिया, जिसमें धारा 366(क)/34 के मामले में पीड़िता का बयान आरोप के पक्ष में नहीं था, पुलिस ने फाइनल फॉर्म दिया था और फिर भी मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया तो हाईकोर्ट ने उसे रद्द कर दिया था। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय के सुरेश गरोदिया बनाम असम राज्य (2024 SCC OnLine SC 38) और विनोद गुप्ता बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024 INSC 181) का भी उल्लेख किया गया, जिनमें एफआईआर में देरी और एफआईआर तथा धारा 164 के बयान के बीच अंतर को धारा 482 के चरण पर विचार योग्य माना गया था।
राज्य की ओर से अपर लोक अभियोजक ने कहा कि मजिस्ट्रेट पुलिस की राय से बँधा नहीं होता और केस डायरी की सामग्री से अपराध बनता दिखे तो वह संज्ञान ले सकता है। साथ ही धारा 164 का बयान अपने आप में सच-झूठ का अंतिम फैसला नहीं करता। सूचक की ओर से भी कहा गया कि मामला एक नाबालिग लड़की का है, इसलिए केवल आरोपियों के पक्ष में आए एक बयान के आधार पर अभियोजन को शुरू में ही समाप्त नहीं कर देना चाहिए।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति झा ने शुरुआत में ही यह दोहराया कि धारा 482 की शक्ति असाधारण है और उसका प्रयोग संयम के साथ होना चाहिए, लेकिन यह भी कहा कि केवल इसलिए कि मजिस्ट्रेट संज्ञान ले चुका है, हाईकोर्ट के हाथ बँध नहीं जाते। यह शक्ति न्याय के उद्देश्य की रक्षा और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए ही है।
फाइनल फॉर्म के सवाल पर कोर्ट ने बिना किसी लाग-लपेट के माना कि पुलिस की अंतिम रिपोर्ट में दी गई राय मजिस्ट्रेट पर बाध्यकारी नहीं है। मजिस्ट्रेट जाँच में जुटाई गई सामग्री पर अपना विवेक लगाकर, पर्याप्त आधार दिखे तो पुलिस से अलग राय बना सकता है। इसलिए केवल यह कह देना कि पुलिस ने फाइनल फॉर्म दिया है, संज्ञान आदेश रद्द कराने का आधार नहीं हो सकता। मगर कोर्ट ने इसके तुरंत बाद कहा कि इस मामले को केवल फाइनल फॉर्म के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। फाइनल फॉर्म एक परिस्थिति है, सात दिन की देरी दूसरी और पीड़िता का धारा 164 का बयान तीसरी, और असल सवाल यह है कि इन सबको मिलाकर देखने पर क्या याचिकाकर्ताओं पर धारा 366(क) के तहत मुकदमा चलाने का पर्याप्त आधार बनता है।
कोर्ट ने धारा 366(क) के स्वरूप की भी याद दिलाई। इस धारा में अपराध तब बनता है जब किसी नाबालिग लड़की को किसी स्थान से जाने या कोई कार्य करने के लिए इस आशय से प्रेरित किया जाए कि उसे किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संभोग के लिए विवश या प्रलोभित किया जाएगा। इस संबंध में न्यायमूर्ति झा ने सत प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य [(2015) 16 SCC 475] के अनुच्छेद 5 और 6 को उद्धृत किया। केवल लड़की के नाबालिग होने से यह जाँच करने की ज़रूरत खत्म नहीं हो जाती कि अपराध के बुनियादी तत्व उस खास आरोपी के विरुद्ध मौजूद हैं या नहीं।
देरी के बारे में कोर्ट का रुख संतुलित रहा। सूचक का स्पष्टीकरण कि वह बेटी को खोज रहा था और समाज के डर से थाने नहीं गया, ट्रायल में परखा जा सकता है, लेकिन धारा 482 के चरण पर जब यह देखना हो कि कार्यवाही जारी रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग तो नहीं, तब आसपास की परिस्थितियों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने साफ़ कहा कि सात दिन की देरी अकेले अभियोजन खत्म करने के लिए काफ़ी नहीं है, पर आगे की जाँच के साथ जोड़कर देखने पर वह प्रासंगिक हो जाती है।
फाइनल फॉर्म की अहमियत के बारे में कोर्ट ने कहा कि उसका महत्व इसमें नहीं है कि मजिस्ट्रेट उससे बँधा था, बल्कि इसमें है कि पुलिस जाँच में ही याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध इतनी सामग्री नहीं मिली कि उन्हें ट्रायल के लिए भेजा जा सके। धारा 164 के बयान पर कोर्ट ने माना कि यह ट्रायल में दोष सिद्ध करने वाला ठोस साक्ष्य नहीं होता। लेकिन जब वह जाँच सामग्री का हिस्सा हो और उसे इसलिए पेश किया गया हो कि आरोप की बुनियाद ही मौजूद नहीं है, तो धारा 482 के चरण पर कोर्ट उससे आँख नहीं मूँद सकता। यहाँ बयान का महत्व यह साबित करना नहीं कि याचिकाकर्ता निर्दोष हैं, बल्कि उससे कहीं अधिक बुनियादी है, क्योंकि जिस लड़की के अपहरण का आरोप है उसी ने अपहरण का समर्थन नहीं किया और याचिकाकर्ताओं पर कोई आरोप नहीं लगाया।
कृष्णा महतो वाले निर्णय को कोर्ट ने काफ़ी प्रासंगिक माना, क्योंकि उसके तथ्य इस मामले से मेल खाते थे, पर साथ ही यह भी कहा कि इसे ऐसा कठोर नियम न समझा जाए कि जब भी पीड़िता का धारा 164 का बयान आरोपी के पक्ष में हो, कार्यवाही अपने आप रद्द हो जाएगी। धारा 482 के निर्णय को उसके तथ्यात्मक संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए। सुरेश गरोदिया और विनोद गुप्ता के बारे में भी कोर्ट ने यही कहा कि वे इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं कि कोर्ट को केवल इस आधार पर अभियोजन चलते रहने नहीं देना चाहिए कि संज्ञान लिया जा चुका है, बल्कि मामला दर्ज होने और आगे बढ़ने की परिस्थितियों को भी देखना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि नाबालिग लड़की से जुड़े आरोपों में संवेदनशीलता के साथ विचार करना ज़रूरी है, लेकिन संवेदनशीलता का मतलब यह नहीं कि जाँच के दौरान आई सामग्री को अनदेखा कर दिया जाए। हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति इसलिए है कि आपराधिक प्रक्रिया उत्पीड़न का हथियार न बन जाए, खासकर तब जब पूरी सामग्री मिलाकर देखने पर भी आरोपी के विरुद्ध मुकदमा चलाने का पर्याप्त आधार न बनता हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह साक्ष्य की उस तरह जाँच नहीं कर रहा जैसी पूर्ण ट्रायल के बाद होती है। प्रश्न केवल इतना है कि उपलब्ध सामग्री पर इन लोगों को ट्रायल की कठिनाई से गुज़ारने का पर्याप्त आधार है या नहीं।
अंत में कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को पुलिस से असहमत होने का पूरा अधिकार था, लेकिन उनके आदेश से यह झलकना चाहिए था कि वह कौन-सी सामग्री थी जिसने उन्हें फाइनल फॉर्म और जाँच सामग्री के बावजूद संज्ञान लेने को प्रेरित किया। जब पीड़िता ने खुद बुनियादी आरोप का समर्थन नहीं किया और जाँच एजेंसी ने भी इन लोगों को ट्रायल के लिए नहीं भेजा, तब इनका मुकदमा झेलना न्याय के हित में नहीं होगा।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2018 के संज्ञान आदेश को, जहाँ तक वह इंदु देवी, अवध नारायण सिंह उर्फ़ हरिद्वार सिंह और अमन कुमार से संबंधित है, रद्द कर दिया और इसी के साथ पीरो थाना कांड संख्या 244/2018 से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही भी इन तीनों के विरुद्ध समाप्त कर दी गई। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि उसकी टिप्पणियाँ केवल इन याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही की वैधता तक सीमित हैं और उन्हें किसी अन्य व्यक्ति के दोष या निर्दोषता पर निर्णय न माना जाए। इसका अर्थ है कि मुख्य आरोपी अमित कुमार के मामले पर इस आदेश का कोई सीधा असर नहीं पड़ा। निचली अदालत के अभिलेख, यदि मँगाए गए हों, निर्णय की प्रति के साथ वापस भेजने का निर्देश भी दिया गया।
पुलिस और अनुसंधान के नज़रिए से
यह निर्णय अनुसंधानकर्ताओं के लिए इस मायने में अहम है कि उसमें जाँच के निष्कर्ष को भी वज़न दिया गया है। मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट से बँधा नहीं है, पर जब जाँच में साफ़ कारणों के साथ किसी को ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया हो और वह निष्कर्ष केस डायरी तथा पीड़िता के धारा 164 के बयान से मेल खाता हो, तो बाद में उसे आसानी से पलटा नहीं जा सकता। इसलिए फाइनल फॉर्म में कारण स्पष्ट और केस डायरी की सामग्री से समर्थित होने चाहिए। एफआईआर और धारा 164 के बयान के बीच कोई अंतर हो तो उसे केस डायरी में दर्ज करना और उसका विश्लेषण करना भी उतना ही ज़रूरी है, क्योंकि आगे चलकर धारा 482 के चरण पर यही अंतर निर्णायक बन सकते हैं। यह भी याद रखने लायक है कि धारा 366(क) में केवल लड़की का नाबालिग होना या घर से चले जाना काफ़ी नहीं है, उसके पीछे के आशय का साक्ष्य भी चाहिए, और मुख्य आरोपी के रिश्तेदारों को आरोपी बनाने से पहले उनकी अलग-अलग भूमिका का आधार जाँच में दिखना चाहिए।
एक बात ध्यान में रखनी होगी कि यह मामला 2018 का है, इसलिए आईपीसी और सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत तय हुआ है। नई संहिताओं में धारा 482 सीआरपीसी की जगह बीएनएसएस की धारा 528 आती है, पर अंतर्निहित शक्ति का सिद्धांत वही रहता है।


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