पटना हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर 2026 को सुनाए एक विस्तृत निर्णय में 1996 के करपी थाना कांड संख्या 68/1996 (तत्कालीन जहानाबाद, अब अरवल) में निचली अदालत की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी और सभी अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। चार लोगों की हत्या के इस मामले में अदालत ने माना कि घटना सच है, लेकिन अपीलकर्ताओं की पहचान अपराधी के रूप में संदेह से परे साबित नहीं हो सकी, और इसकी सबसे बड़ी वजह उसने पुलिस जाँच की गंभीर खामियों को बताया। अदालत ने बिहार के डीजीपी को तीन वरिष्ठ अधिकारियों की समिति बनाकर जाँच अधिकारी के काम की समीक्षा करने का निर्देश भी दिया। मामला उपेंद्र यादव एवं अन्य बनाम बिहार राज्य (Cr. Appeal (DB) No. 545 of 2023 एवं जुड़ी अपीलें) के नाम से दर्ज है। निर्णय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति कुमार मनीष की खंडपीठ का है, जिसे न्यायमूर्ति प्रसाद ने लिखा है और जिसे AFR घोषित किया गया है।
घटना और मुकदमा
अभियोजन के अनुसार केयाल गाँव के पास के एक आहर में सिंचाई का पानी जमा रहता था और पड़ोसी आसाढ़ी गाँव के लोगों पर रात में उसका बाँध काटने का आरोप था। इसी वजह से केयाल के लोग रात में आहर किनारे बनी झोपड़ी में पहरा देते थे। 8 अगस्त 1996 की रात करीब 11 बजे सूचक शिव नारायण सिंह समेत कई लोग वहाँ थे, तभी तीस-चालीस हथियारबंद लोग आए, खुद को "पार्टी" का बताया और गोलियाँ चला दीं। भरत सिंह, मांगर सिंह, नवलेश सिंह और राम निवास सिंह की जान गई (राम निवास की रास्ते में मौत हुई) और प्रमोद कुमार घायल हुए।
9 अगस्त 1996 को तड़के करीब पाँच बजे घटनास्थल पर ही उपनिरीक्षक ललितेश्वर पांडेय (PW-27) ने सूचक का फर्दबयान दर्ज किया। उसमें सूचक ने कहा कि वारदात मजदूर किसान संग्राम परिषद (MKSP) के उग्रवादियों ने की और वह कुछ को देखकर पहचान लेगा, पर किसी का नाम नहीं लिया। कांड अज्ञात आरोपियों के विरुद्ध दर्ज हुआ। जाँच के बाद 15 नवंबर 1996 को चौबीस लोगों के विरुद्ध आरोप-पत्र गया। सत्र परीक्षण संख्या 65/1998 में सत्ताईस गवाह पेश हुए, जिनमें छह पक्षद्रोही हो गए। 3 अप्रैल 2023 को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-II, जहानाबाद ने तेरह लोगों को धारा 302/34, 307/34, 148 आईपीसी और आर्म्स एक्ट की धारा 27 में दोषी ठहराया और 12 अप्रैल 2023 को आजीवन कठोर कारावास सुनाया। इसी के विरुद्ध छह अलग-अलग अपीलें हाईकोर्ट पहुँचीं।
दलीलें
अपीलकर्ताओं का तर्क था कि फर्दबयान में, और घटना के ढाई महीने बाद दिए गए प्रोटेस्ट पिटीशन में भी, किसी आरोपी का नाम नहीं था। उनके अनुसार पहचान का एकमात्र जरिया टॉर्च बताई गई, जो न बरामद हुई और न गवाह यह बता पाए कि उसे किसने जलाया। इसके अलावा जब्ती सूची, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और डॉक्टर की गवाही अदालत में आई ही नहीं। राज्य ने कहा कि निचली अदालत का निर्णय सही है और डोमे यादव, आर. बैजू जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला दिया कि पहचान परेड न होने से अदालत में हुई पहचान अमान्य नहीं होती और दोषपूर्ण जाँच अपने आप अभियोजन को नहीं गिराती, खासकर जब घायल गवाह की गवाही मौजूद हो।
गवाहों पर अदालत का निष्कर्ष
चारों प्रत्यक्षदर्शी गवाह भोला सिंह (PW-7), प्रेमनाथ सिंह (PW-8), सूचक शिव नारायण सिंह (PW-12) और घायल प्रमोद कुमार (PW-13) अदालत को भरोसेमंद नहीं लगे। भोला सिंह और प्रेमनाथ सिंह दोनों ने कहा कि उन्होंने टॉर्च की रोशनी में आरोपियों को पहचाना, पर किसी को न नाम बताया, न पुलिस के पास गए, और उनके बयान घटना के सात-आठ दिन बाद दर्ज हुए। दोनों इस पर भी एकमत नहीं थे कि टॉर्च किसने जलाई। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के तमिलसेल्वन वाले निर्णय का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जब टॉर्च हमलावरों के हाथ में हो और रोशनी गवाहों की ओर पड़े तो गवाह आंशिक रूप से अंधे हो जाते हैं और पहचान नहीं कर पाते।
सूचक का बयान घटना के स्थान, तारीख और समय के बारे में विश्वसनीय माना गया, पर उसने न फर्दबयान में, न बाद में किसी का नाम लिया। मुकदमे में उसने कहा कि नाम उसे बिंदा यादव के बयान से पता चले, जो कभी रिकॉर्ड पर आया ही नहीं। घायल प्रमोद कुमार की मौजूदगी पर शक नहीं था, पर उसने भी पुलिस को किसी का नाम नहीं बताया था और आठ साल बाद अदालत में धनंजय यादव को पहली बार, नाम लिए बिना, पहचाना। झोपड़ी के बाहर खड़े लोगों को टॉर्च की रोशनी में पहचान लेना अदालत ने असंभव माना। पंचायत भवन से देखने का दावा करने वाले परिस्थितिजन्य गवाहों को अदालत ने एक ही ढर्रे पर बोलता पाया, और पहले जाँच अधिकारी ने खुद कहा था कि किसी ने उसके सामने ऐसी बात नहीं बताई थी, इसलिए यह कहानी बाद में गढ़ी गई लगी।
अनुसंधान की खामियाँ
निर्णय का केंद्र यही हिस्सा है। फर्दबयान में सूचक कह चुका था कि वह उग्रवादियों को देखकर पहचान लेगा, यानी अज्ञात आरोपियों का मामला था जिसमें पहचान परेड (TIP) सामान्य सावधानी है। फिर भी दोनों जाँच अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने इसे जरूरी नहीं समझा। दूसरे अधिकारी ने कहा कि घायल प्रमोद कुमार बेहोश था, पर उसके ठीक होने के बाद भी परेड नहीं कराई गई। अदालत ने इसे जाँच अधिकारी की "vital lapse" कहा। उसने यह भी साफ़ किया कि परेड न होने से अदालत की पहचान स्वतः अमान्य नहीं होती, पर जब गवाहों ने आरोपियों की कोई विशिष्ट पहचान नहीं बताई और वे उनके लिए अजनबी थे, तो परेड के बिना पहचान को पुष्ट करने वाला कोई सहारा नहीं बचता।
घटनास्थल से तीन .303 के खोखे, खून से सनी मिट्टी, कंबल, लाठी, चारपाई, चप्पल और कपड़े मिलने की बात तो कही गई, पर किसी की जब्ती सूची नहीं बनी, जब्ती गवाहों के नाम नहीं दर्ज हुए और कुछ भी एफएसएल नहीं भेजा गया। चारों शवों का पोस्टमार्टम हुआ, पर रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं आई और चिकित्सक की गवाही नहीं हुई, इसलिए मौत का कारण चिकित्सकीय दस्तावेज से साबित नहीं हो सका। घटनास्थल पर गोली लगने से घायल बताए गए बिंदा यादव को सोलह दिन बाद पीएमसीएच में इलाज के दौरान गिरफ्तार किया गया, पर उसकी चोटों का ब्योरा अदालत में कभी नहीं आया और उसके घर पर छापेमारी का कोई सबूत नहीं मिला, जबकि सूचक ने उसी दिन दोबारा बयान देकर बताया था कि एक अपराधी को गोली लगी है। न MKSP से संबंध की जाँच हुई और न आरोपियों के घरों से हथियार बरामद करने की कोशिश, जबकि आसाढ़ी गाँव से पानी के विवाद का जिक्र फर्दबयान में ही था। अदालत ने कहा कि पुलिस अधीक्षक जैसे वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अनुसंधान का पर्यवेक्षण नहीं किया और ऐसा लगता है कि मामले को शुरू से दबाने की मंशा थी। अभियोजन की ओर से भी धारा 313 सीआरपीसी के बयान में आरोपियों के सामने वे परिस्थितियाँ नहीं रखी गईं जिनके आधार पर सजा हुई थी, जैसे टॉर्च की रोशनी में पहचान या बिंदा यादव को गोली लगना।
बरी क्यों, और राज्य को निर्देश
खंडपीठ ने माना कि केवल दोषपूर्ण जाँच के आधार पर आरोपी को छोड़ा नहीं जा सकता, और हरेंद्र राय बनाम बिहार राज्य का उल्लेख किया कि जाँच अधिकारी की जानबूझकर की गई चूक का लाभ आरोपी को नहीं मिलना चाहिए। लेकिन अदालत ने कहा कि इस मामले में पहचान के बिंदु पर कोई स्वतंत्र और भरोसेमंद मौखिक साक्ष्य मौजूद नहीं है, इसलिए सावधानी के नियम से कठघरे में हुई पहचान को खारिज करना पड़ा। कृष्णा मोची बनाम बिहार राज्य के आधार पर यह तर्क भी रखा गया था कि भरोसेमंद एक या दो गवाह भी काफी हो सकते हैं, पर खंडपीठ ने कहा कि वहाँ भी शर्त गवाह के भरोसेमंद होने की है, जो यहाँ साबित नहीं हुई। अदालत ने ब्लैकस्टोन के कथन और नरेंद्र कुमार बनाम दिल्ली एनसीटी के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि शक कितना भी मजबूत हो, प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। इसलिए निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी गई और हिरासत में मौजूद अपीलकर्ताओं को, किसी अन्य मामले में आवश्यक न होने पर, तुरंत रिहा करने का आदेश हुआ।
अदालत ने मामला यहीं नहीं छोड़ा। उसने सर्वोच्च न्यायालय के गुजरात राज्य बनाम किशनभाई (2014) 5 SCC 108 को दोहराया, जिसके अनुसार हर बरी होने वाला मामला न्याय-व्यवस्था की विफलता है, गृह विभाग को हर बरी करने वाले आदेश की जाँच कर कारण दर्ज करने चाहिए और जिम्मेदार अनुसंधान या अभियोजन अधिकारियों की पहचान कर, चूक दोषपूर्ण हो तो, विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि उसने पहले भी बिहार के गृह विभाग और डीजीपी को ऐसे मामलों में निर्देश दिए हैं, पर यह पता नहीं कि उनका पालन हुआ या कोई नतीजा निकला। इस बार उसने डीजीपी को निर्देश दिया कि वे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पुलिस अधिकारियों की तीन सदस्यीय समिति बनाएँ, जो उस जाँच अधिकारी के अनुसंधान के तरीके पर राय दे, और निर्णय की प्रति मिलने से तीन महीने के भीतर प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लें। की गई कार्रवाई की जानकारी अपीलकर्ताओं को देनी होगी। गृह विभाग से एक माह में यह बताने को कहा गया कि ऐसे मामलों की समीक्षा की उसकी नीति क्या है और कितनी जाँच बैठी तथा उनका क्या नतीजा रहा। निर्णय की प्रति गृह विभाग, डीजीपी कार्यालय और अभियोजन निदेशक को भेजी जाएगी।
पुलिस अधिकारियों के लिए
फर्दबयान में जब सूचक कहे कि वह आरोपी को देखकर पहचान लेगा, तो पहचान परेड कराना जाँच अधिकारी की जिम्मेदारी है और "जरूरी नहीं समझा" जैसा कारण अदालत में नहीं टिकता। घटनास्थल की हर वस्तु की जब्ती सूची, जब्ती गवाह और एफएसएल जाँच जरूरी है, और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा चिकित्सक की गवाही सुनिश्चित करना भी अनुसंधान और अभियोजन का हिस्सा है। घायल आरोपी की चोट और इलाज का रिकॉर्ड जुटाना और देर किए बिना छापेमारी करना जरूरी है, और वरिष्ठ अधिकारियों को अनुसंधान का पर्यवेक्षण करना चाहिए। निर्णय आईपीसी-सीआरपीसी के दौर की घटना पर है, पर ये सिद्धांत बीएनएस और बीएनएसएस के तहत होने वाले अनुसंधान पर भी उतने ही लागू होंगे।
फोटो: पटना उच्च न्यायालय का प्रवेश द्वार। छायाकार: Shivamsetu, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0।


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