हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम अंचला उर्फ चंचला | 2026 INSC 1074
एक नज़र में
| मामला | हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम अंचला उर्फ चंचला |
| अपील संख्या | क्रिमिनल अपील नंबर 166 / 2019 |
| उद्धरण | 2026 INSC 1074 |
| पीठ | जस्टिस मनोज मिश्रा (फैसला लिखा) और जस्टिस विजय बिश्नोई |
| फैसले की तारीख | 1 अक्टूबर 2026 |
| अपील किसकी | राज्य सरकार की, हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले के खिलाफ |
| नतीजा | अपील खारिज, आरोपी का बरी होना बरकरार |
| मूल फैसला | PDF पढ़ें / डाउनलोड करें (60 पृष्ठ) |
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भूमिका
किसी भी आपराधिक मामले में पुलिस की जांच ही अदालत के सामने सच की तस्वीर बनाती है। लेकिन अगर जांच अधिकारी उस तस्वीर में अपनी तरफ से रंग भरने लगे, यानी ऐसे गवाह खड़े कर दे जिनका घटना से कोई स्वाभाविक संबंध नहीं, तो न्याय की पूरी इमारत हिल जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 को हिमाचल प्रदेश के 15 साल पुराने एक दोहरे हत्याकांड में यही बात दोहराई। कोर्ट ने साफ कहा कि जांच अधिकारी की भूमिका सबूत इकट्ठा करने की है, सबूत बनाने की नहीं। यह फैसला केवल एक केस का निपटारा नहीं, बल्कि हर जांच अधिकारी के लिए एक दिशा-निर्देश की तरह है कि गवाहों के बयान किस आधार पर, कब और क्यों दर्ज किए गए, यह बताना कितना जरूरी है।
मामला क्या था
7 सितंबर 2011 को हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के दियूर गांव में एक बुजुर्ग व्यक्ति (PW-1) ने पुलिस को बताया कि उनकी बेटी 6–7 दिन से लापता है, उसका घर बंद पड़ा है और अंदर से बदबू आ रही है। पुलिस ने ताला तोड़कर घर में प्रवेश किया तो वहां दो शव मिले: एक महिला (D-1) और उसके नाबालिग बेटे (D-2) का। पोस्टमार्टम में पता चला कि दोनों की मौत गला घोंटने से हुई थी, और मौत 5 से 7 दिन पहले हुई थी।
मृत महिला, अमर सिंह की दूसरी पत्नी थीं। आरोपी अंचला उर्फ चंचला, अमर सिंह की पहली पत्नी की बेटी थीं, यानी मृत महिला की सौतेली बेटी और मृत बच्चे की सौतेली बहन। वे चंबा में रहती थीं और हर 2–3 महीने में दियूर आती-जाती थीं।
अभियोजन (पुलिस) की कहानी: 31 अगस्त 2011 की शाम आरोपी मृतका के घर पर थीं। पिता की संपत्ति सौतेले भाई को वसीयत किए जाने से नाराज होकर उन्होंने दोनों की हत्या कर दी। फिर रात में टैक्सी से चंबा लौटकर एक होटल में रुकीं।
पुलिस ने कौन-से सबूत पेश किए
- आखिरी बार साथ देखा जाना (Last Seen): PW-1 (मृतका के पिता) का बयान कि 31 अगस्त की शाम आरोपी घर पर थीं।
- टैक्सी ड्राइवर (PW-4): उसने कहा कि वह आरोपी को शाम को चंबा से दियूर ले गया, और आधी रात के बाद वापस चंबा के एक होटल में छोड़ा। उस समय आरोपी के बाएं अंगूठे से खून बह रहा था और उसने प्राथमिक उपचार दिया।
- होटल कर्मचारी (PW-18): उसने कहा कि उस रात आरोपी होटल में आई थीं।
- बरामदगी: गिरफ्तारी के बाद आरोपी के खुलासे पर मृतका का मोबाइल (बिना सिम) और चाबियों का गुच्छा बरामद हुआ। FSL के अनुसार कुछ चाबियां उस ताले में लगीं जो घर के दरवाजे से तोड़ा गया था।
- DNA: घर में रखे एक ट्रंक/कैबिनेट से खुरची गई सूखी खून की परत का DNA आरोपी के खून से मेल खा गया।
- अंगूठे की चोट: आरोपी ने 1 सितंबर 2011 को अंगूठे पर टांके लगवाए थे, जिसकी OPD पर्ची मिली।
- मकसद (Motive): संपत्ति विवाद।
ट्रायल कोर्ट (चंबा सेशन कोर्ट) ने 7 नवंबर 2012 को इन परिस्थितियों को एक पूरी कड़ी मानते हुए आरोपी को IPC धारा 302 (हत्या) में दोषी ठहराया।
हिमाचल हाईकोर्ट ने 28 जुलाई 2014 को फैसला पलट दिया और आरोपी को बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि मकसद साबित नहीं हुआ, PW-1 ने अपने पहले बयान में सुधार किया, टैक्सी ड्राइवर और होटल कर्मचारी भरोसेमंद नहीं, ताले की पहचान संदिग्ध है, और DNA मिलान अकेले निर्णायक नहीं।
इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या याद दिलाया: बरी करने के फैसले में दखल कब
कोर्ट ने कहा कि यह बरी करने के खिलाफ अपील है। बरी होने से आरोपी की निर्दोषता की धारणा और मजबूत हो जाती है। अगर हाईकोर्ट का नजरिया सबूतों के आधार पर संभव नजरियों में से एक है, और उसमें कोई गंभीर गलती (perversity) नहीं, तो केवल इसलिए दखल नहीं दिया जाएगा कि दूसरा नजरिया भी संभव है। कोर्ट ने इसके लिए राजेश प्रसाद बनाम बिहार राज्य (2022), राजस्थान राज्य बनाम शेरा राम (2012) और मध्य प्रदेश राज्य बनाम बच्चूदास (2007) का हवाला दिया।
परिस्थितिजन्य सबूतों पर कोर्ट ने हनुमंत बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1952) और शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) के सिद्धांत दोहराए। हर परिस्थिति पूरी तरह साबित हो, सब मिलकर केवल आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा करें, और कड़ी इतनी पूरी हो कि निर्दोष होने की कोई उचित संभावना न बचे।
फैसले का केंद्र: "बनाए गए" गवाह
सबसे अहम हिस्सा टैक्सी ड्राइवर (PW-4) और होटल कर्मचारी (PW-18) की गवाही का है, क्योंकि इन्हीं दोनों के सहारे पुलिस ने आरोपी को घटना की रात दियूर में मौजूद दिखाया था।
कोर्ट ने इन दोनों की विश्वसनीयता पर दो बुनियादी सवाल उठाए:
- जांच अधिकारी (PW-20) ने यह नहीं बताया कि उसे इन दोनों के बयान दर्ज करने की प्रेरणा कहां से मिली।
- बार-बार पूछे जाने पर भी जांच अधिकारी ने यह नहीं बताया कि इनके बयान किस तारीख को दर्ज हुए।
"आम आदमी को यह मामूली लगे, पर प्रशिक्षित न्यायिक दिमाग के लिए अहम"
कोर्ट ने कहा (पैरा 41, भावार्थ): आम आदमी को ये बातें गवाह की विश्वसनीयता परखने में अप्रासंगिक लग सकती हैं, लेकिन एक प्रशिक्षित न्यायिक दिमाग के लिए यह तय करने में बहुत अहम है कि गवाह स्वाभाविक है या सबूत बनाने के लिए खड़ा किया गया है। जब किसी व्यक्ति को कोई ऐसी बात पता होती है जो उसकी समझ में अपराध से जुड़ी है, तो वह जिम्मेदार नागरिक के नाते पुलिस को बता सकता है। लेकिन जो बात अपने आप में आपत्तिजनक ही नहीं लगती, उसे लेकर कोई पुलिस के पास नहीं जाता।
मूल सिद्धांत (पैरा 42)
"It is well settled that the role of the investigating officer is to collect evidence and not to create one."
यानी यह स्थापित सिद्धांत है कि जांच अधिकारी की भूमिका सबूत जुटाने की है, सबूत बनाने की नहीं। कोर्ट ने आगे कहा कि जहां न तो जांच अधिकारी के पास किसी व्यक्ति का बयान दर्ज करने का कोई मौका था, न उस व्यक्ति के पास पुलिस को जानकारी देने का, फिर भी पुलिस बिना कारण बताए उसका बयान दर्ज करती है, तो गंभीर संदेह पैदा होता है कि गवाह को सबूत बनाने के लिए खड़ा किया गया है।
सही जांच और गढ़ी गई जांच में फर्क (पैरा 43–44)
कोर्ट ने संतुलन भी रखा। जांच अधिकारी किसी एक बयान से सुराग लेकर दूसरे व्यक्ति का बयान दर्ज कर सकता है, और यह पूरी तरह सही है। जैसे, A के बयान से पता चले कि B को कुछ जानकारी हो सकती है, तो B का बयान लेना उचित है। लेकिन अगर अधिकारी सीधे B का बयान दर्ज कर ले, जबकि यह मानने का कोई ठोस कारण नहीं कि B के पास जानकारी है, और B के पास खुद पुलिस को बताने की कोई वजह नहीं, तो शक होगा कि यह सबूत गढ़ने के लिए किया गया।
कोर्ट ने बताया कि आमतौर पर जांच अधिकारी किन लोगों से सबूत जुटाता है:
- घटनास्थल पर मौजूद लोग, या जिन्हें अपराध की जानकारी हो
- पीड़ित या आरोपी के रिश्तेदार और करीबी
- पीड़ित या संदिग्ध के मोबाइल की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से पता चले संपर्क
- आरोपी के खुलासे (disclosure statement) से मिली जानकारी
अगर गवाह इनमें से किसी रास्ते से नहीं आया, तो "जांच अधिकारी को उसका बयान लेने की प्रेरणा कहां से मिली", यह सवाल अहम हो जाता है। इसका जवाब न देना गवाह की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
इस केस में क्या हुआ (पैरा 45–46)
कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी (PW-20) बयान दर्ज करने की तारीख के सवाल से "बचता रहा और अनजान बनने का दिखावा करता रहा"। उसने यह भी नहीं कहा कि आरोपी ने अपने खुलासे में टैक्सी या होटल की बात बताई थी। खुलासे में केवल चाबी और मोबाइल बरामद कराने की बात थी। मृतका के पिता ने भी यह नहीं कहा कि आरोपी टैक्सी से आई थीं।
"...travelling in a taxi, or staying in a hotel, by itself is not an incriminating circumstance as to disturb a person and prompt him to report it to the police."
यानी टैक्सी में सफर करना या होटल में ठहरना अपने आप में ऐसी आपत्तिजनक बात नहीं कि कोई व्यक्ति परेशान होकर खुद पुलिस को बताने जाए। इसलिए कोर्ट ने कहा कि कारण न बताना ही इन्हें "परिस्थितियों की कड़ी बनाने के लिए खड़े किए गए गवाह" मानने के लिए काफी है।
बाकी कमियां
- टैक्सी ड्राइवर: उसने खून बहते अंगूठे पर पट्टी करने की बात कही, लेकिन गाड़ी में खून की एक बूंद तक नहीं देखी। उसने किराए की कोई रसीद भी नहीं दी। और अगर आरोपी ने आने-जाने के लिए टैक्सी की थी, तो चंबा में अपना घर होते हुए होटल में रुकने की जरूरत क्या थी?
- होटल कर्मचारी: उसने खुद माना कि आरोपी के ठहरने का कोई रिकॉर्ड पुलिस को नहीं दिया गया। हर होटल-सराय को गेस्ट रजिस्टर रखना होता है, इसलिए रिकॉर्ड न होना उसकी गवाही को गंभीर रूप से कमजोर करता है।
- टैक्सी ड्राइवर का बयान गिरफ्तारी के बाद हुआ (पैरा 80): ड्राइवर ने जिरह में माना कि पुलिस ने उससे "करीब 9–10 दिन बाद" संपर्क किया, थाने बुलाया, और DySP ने पूछा कि क्या वह कटघरे में खड़ी आरोपी को जानता है। कोर्ट ने कहा कि उस समय तक पुलिस आरोपी के अंगूठे की चोट देख चुकी थी और उसके पास OPD पर्ची भी थी। यानी पुलिस के पास "घटनास्थल से खून बहती चोट लेकर लौटने" की कहानी बुनने का मौका था। ड्राइवर को "कहानी बुनने के औजार" के रूप में इस्तेमाल किए जाने की संभावना ज्यादा लगती है।
जांच की दूसरी बड़ी चूक: मोबाइल टावर लोकेशन नहीं निकाली (पैरा 51–54)
पुलिस के पास मृतका और आरोपी दोनों के मोबाइल नंबर थे। CDR भी मंगाई गई, लेकिन:
- CDR में टावर लोकेशन नहीं ली गई, जिससे पता चलता कि घटना के समय दोनों फोन पास-पास थे या नहीं, और मृतका का फोन आरोपी के घर तक कैसे पहुंचा।
- मृतका के मोबाइल की CDR अदालत में पेश ही नहीं की गई।
- जांच अधिकारी ने यह तक नहीं बताया कि 31 अगस्त के बाद मृतका का फोन चालू था या नहीं।
कोर्ट ने इसे "गंभीर जांच चूक" कहा। अगर फोन 31 अगस्त के बाद भी चालू मिलता, तो पिता का "फोन बंद था" वाला बयान झूठा साबित होता। टावर लोकेशन से अभियोजन की कहानी या तो पुख्ता होती या ढह जाती। फैसले के सारांश में कोर्ट ने यहां तक कहा कि CDR और टावर लोकेशन दबाना यह धारणा बनाता है कि अभियोजन अहम जानकारी छिपा रहा है।
"आखिरी बार साथ देखे जाने" की गवाही भी कमजोर (पैरा 32–35, 55–56)
- मृतका के पिता ने अदालत में कहा कि उन्होंने आरोपी को अपने नाती से बात करते देखा, लेकिन पुलिस को दिए पहले बयान (धारा 161 CrPC) में यह बात नहीं थी। पहले बयान में उन्होंने केवल इतना कहा था कि बाहर से पूछने पर बेटी ने अंदर से बताया कि आरोपी रात में रुकेगी। कोर्ट ने इसे बयान में सुधार (improvement) माना।
- पिता उसी इलाके में दुकान चलाते थे, और उन्होंने माना कि बेटी ने घर का एक कमरा उन्हें और उनकी पत्नी को दिया था। फिर भी 6–7 दिन तक घर बंद रहने पर उन्होंने कुछ नहीं किया। "शायद मणिमहेश यात्रा पर गई होगी" वाली बात की पुलिस ने कोई जांच नहीं की: क्या यात्रा की योजना थी, टैक्सी बुक थी, या बस से जाना था?
- पोस्टमार्टम के अनुसार मौत 5–7 दिन पहले हुई थी, यानी मौत 1 या 2 सितंबर को होने की संभावना भी खारिज नहीं होती।
- पिता ने खुद बताया था कि 31 अगस्त की शाम शौकत और नूरा नाम के दो लोग मृतका के घर गए थे, और बहू के मुताबिक वे मृतका की संपत्ति के बारे में पूछताछ कर रहे थे। हाईकोर्ट ने कहा था कि तीसरे पक्ष की संलिप्तता की गहराई से जांच होनी चाहिए थी।
ताला और चाबी: पहचान ही साबित नहीं (पैरा 58–66)
चाबियों की बरामदगी तभी मायने रखती, जब यह साबित होता कि अदालत में पेश ताला वही था जिससे घर का दरवाजा बंद था और जिसे तोड़ा गया। लेकिन:
- जब्ती के गवाह (PW-3) ने जिरह में कहा कि जब वह पहुंचा तो ताला दरवाजे के हैंडल पर था, कुंडी पर नहीं।
- ताला तोड़ते समय मौजूद सब-इंस्पेक्टर (PW-15) ने अदालत में पेश ताले की पहचान नहीं की।
- जांच अधिकारी खुद ताला टूटने का गवाह नहीं था। उसके पहुंचने तक ताला टूट चुका था।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे में चाबियों की बरामदगी बेमानी है। साथ ही यह भी तर्कसंगत नहीं लगता कि दूसरी जगह रहने वाली आरोपी दरवाजे पर ताला लगाकर चाबियां अपने साथ ले जाएं। कोर्ट ने इस बरामदगी को "कृत्रिम" बताया।
मोबाइल की बरामदगी भी संदिग्ध (पैरा 67–68)
कोर्ट ने तीन कारण गिनाए:
- मोबाइल की CDR अदालत में पेश नहीं की गई, और जांच अधिकारी चुप रहा कि फोन 1 सितंबर को बंद था या चालू।
- मोबाइल को घटनास्थल से उठाकर कहीं भी "प्लांट" किया जा सकता है। इसलिए शक दूर करने के लिए पूरी CDR और टावर लोकेशन पेश करनी चाहिए थी।
- जिसके पास अपना मोबाइल है, वह मृतका का मोबाइल अपने घर क्यों ले जाएगा? कोई और कीमती सामान ले जाने का सबूत भी नहीं है।
DNA मिलान: सबूत है, पर निर्णायक नहीं (पैरा 69–79)
यह हिस्सा जांच के तरीके पर कई सवाल उठाता है:
- घर से 10 सितंबर को कई चीजें उठाई गईं: गद्दा, तकिए का कवर, चादर, ट्रंक का कपड़ा।
- आरोपी के खून का नमूना 11 सितंबर को लिया गया, और सभी नमूने लैब में उसके बाद भेजे गए।
- FSL रिपोर्ट में गद्दे और फर्श के खून से DNA नहीं मिल सका, क्योंकि वह बहुत खराब हो चुका था। केवल ट्रंक से खुरचे गए खून और धागे से उठाए गए खून का DNA बना, और वह आरोपी से मेल खाया।
- ट्रंक का कंट्रोल सैंपल लैब नहीं भेजा गया। आरोपी की हथेली के निशान भी फिंगरप्रिंट ब्यूरो भेजे गए, पर उनकी कोई रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं आई।
कोर्ट ने कहा कि एक ही समय के खून के धब्बों में से बाकी सब खराब हो जाएं और केवल एक जगह का बचा रहे, "यह बात हमें हैरान करती है।" लेकिन रिपोर्ट बनाने वाले विशेषज्ञ से जिरह नहीं हुई, और बचाव पक्ष ने सील से छेड़छाड़ साबित करने की ज्यादा कोशिश नहीं की। इसलिए कोर्ट ने रिपोर्ट को जैसी है वैसी स्वीकार किया।
फिर भी कोर्ट ने कहा (पैरा 79) कि कमरे में आरोपी का खून मिलना ज्यादा से ज्यादा यह बताता है कि किसी समय आरोपी वहां थीं। यह नहीं बताता कि 31 अगस्त को थीं। अभियोजन खुद मानता है कि आरोपी नियमित रूप से उस घर में आती थीं, इसलिए पहले कभी चोट से खून गिरने की संभावना खारिज नहीं होती। सबसे अहम, आरोपी का खून न तो मृतकों के कपड़ों पर मिला, न उस कपड़े पर जिससे गला घोंटा गया।
अंगूठे की चोट और मकसद (पैरा 80–82)
- चोट: आरोपी ने बताया कि मणिमहेश जाते समय उनका अंगूठा कार के दरवाजे में दब गया था। OPD पर्ची उन्होंने खुद पुलिस को दी थी। टैक्सी ड्राइवर और होटल कर्मचारी की गवाही खारिज होने के बाद इस चोट का वजन बहुत कम रह गया।
- मकसद: संपत्ति की वसीयत सौतेले भाई के नाम होने का कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं आया। आरोपी के पिता की पहली पत्नी से पांच बेटियां थीं, इसलिए सौतेले भाई के न रहने का फायदा अकेले आरोपी को नहीं मिलता। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य मामलों में मकसद का न होना अपने आप घातक नहीं, लेकिन जब बाकी परिस्थितियां निर्णायक न हों, तो यह संदेह का लाभ देने का अहम आधार बन जाता है।
अंतिम निष्कर्ष (पैरा 83–84)
कोर्ट ने कहा कि न तो आपत्तिजनक परिस्थितियां संदेह से परे साबित हुईं, न वे ऐसी पूरी कड़ी बनाती हैं जो केवल आरोपी को दोषी बताए। इसलिए हाईकोर्ट के फैसले में दखल का कोई कारण नहीं। राज्य की अपील खारिज हुई, और आरोपी का बरी होना बरकरार रहा।
जांच अधिकारियों के लिए सबक: इस फैसले से निकली चेकलिस्ट
- हर गवाह तक पहुंचने का कारण केस डायरी में लिखें: किस बयान, CDR, खुलासे या सूचना से उस गवाह का पता चला।
- बयान की तारीख और परिस्थिति दर्ज करें, और अदालत में पूछे जाने पर साफ बताएं।
- स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि जुटाएं: टैक्सी हो तो रसीद या ट्रिप रिकॉर्ड, होटल हो तो गेस्ट रजिस्टर।
- CDR के साथ टावर लोकेशन जरूर लें, और पीड़ित व आरोपी दोनों के फोन की CDR अदालत में पेश करें।
- जब्ती की कड़ी पक्की करें: ताला कहां लगा था, किसने तोड़ा, किसने पहचाना, सब एक-दूसरे से मेल खाए।
- फॉरेंसिक नमूने आरोपी का सैंपल लेने से पहले लैब भेजें, कंट्रोल सैंपल भेजें, और हर रिपोर्ट (जैसे फिंगरप्रिंट) रिकॉर्ड पर लाएं।
- दूसरे संदिग्धों की जांच करें: जिन लोगों का जिक्र गवाहों ने किया (इस केस में दो बाहरी लोग), उनकी जांच न करना पूरे केस को कमजोर करता है।
आम नागरिक के लिए इसका मतलब
यह फैसला बताता है कि अदालतें केवल यह नहीं देखतीं कि गवाह ने क्या कहा, बल्कि यह भी देखती हैं कि गवाह पुलिस तक पहुंचा कैसे। अगर कोई "सुविधाजनक" गवाह अचानक सामने आए और पुलिस यह न बता सके कि उसे उसकी जानकारी कहां से मिली, तो उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जाएगा। यह निर्दोष लोगों को गढ़े गए सबूतों से बचाने की एक अहम सुरक्षा है।
साथ ही यह फैसला कमजोर जांच की कीमत भी दिखाता है। एक मां और उसके नाबालिग बेटे की हत्या हुई, लेकिन 15 साल बाद भी अदालत में यह साबित नहीं हो सका कि हत्या किसने की। जांच में टावर लोकेशन, गेस्ट रजिस्टर, तीसरे पक्ष की भूमिका जैसी बुनियादी चीजें छूट गईं।
नोट: यह लेख सुप्रीम कोर्ट के मूल फैसले (हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम अंचला उर्फ चंचला, क्रिमिनल अपील नंबर 166/2019, 2026 INSC 1074, निर्णय दिनांक 1 अक्टूबर 2026) के आधार पर लिखा गया है। अंग्रेजी उद्धरण फैसले से ज्यों के त्यों लिए गए हैं, बाकी हिस्से हिंदी भावार्थ हैं। मृतकों के नाम जानबूझकर नहीं दिए गए हैं। यह लेख कानूनी सलाह नहीं है। मूल फैसला: PDF
— सोनालाल सिंह, पुलिस उपाधीक्षक (से० नि०)


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