सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मामला चल रहा है, जिसमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण ढांचे को लेकर बड़ा सवाल उठाया गया है। रामाशंकर प्रजापति और अन्य लोगों की ओर से दाखिल याचिका में मांग की गई थी कि इन आरक्षित श्रेणियों के भीतर भी आय के आधार पर अलग उप-कोटा बनाया जाए। केंद्र सरकार ने अब इस मांग का पुरजोर विरोध करते हुए अपना जवाब दाखिल किया है।
मामला क्या है
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि SC, ST और OBC श्रेणियों के भीतर भी आर्थिक असमानता मौजूद है — यानी इन श्रेणियों में भी कुछ लोग बेहद गरीब हैं और कुछ अपेक्षाकृत संपन्न। उनकी मांग थी कि हर श्रेणी के भीतर आर्थिक रूप से सबसे कमजोर लोगों को प्राथमिकता मिले, ताकि आरक्षण का लाभ सही मायने में सबसे जरूरतमंद तक पहुंच सके। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई थी, जो नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है।
आरक्षण किस आधार पर बना है — केंद्र का जवाब
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में समझाया कि भारत में आरक्षण व्यवस्था शुरू से ही सामाजिक और ऐतिहासिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर बनाई गई है, न कि किसी परिवार की आय को देखकर। सरकार के अनुसार:
- अनुसूचित जातियों को सदियों से चली आ रही छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है
- अनुसूचित जनजातियों की समस्या रही है भौगोलिक दूरी, अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान, और मुख्यधारा से कटाव
- पिछड़े वर्गों (OBC) की पहचान सामाजिक, शैक्षिक पिछड़ेपन और सरकारी नौकरियों-शिक्षा में कम भागीदारी के आधार पर
होती है
सरकार ने कहा कि ये तीनों आधार आपस में जुड़े जरूर हैं, लेकिन इनका आर्थिक स्थिति से सीधा कोई संबंध नहीं है। इसीलिए सिर्फ आय के आधार पर इन श्रेणियों के भीतर नया वर्गीकरण बनाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा।
संविधान के प्रावधानों का हवाला
सरकार ने अपने जवाब में संविधान के तीन महत्वपूर्ण अनुच्छेदों का जिक्र किया:
- अनुच्छेद 341 — जो राष्ट्रपति को अनुसूचित जातियों की सूची अधिसूचित करने का अधिकार देता है
- अनुच्छेद 342 — जो अनुसूचित जनजातियों की सूची से जुड़ा है
- अनुच्छेद 342A — जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान से संबंधित है
सरकार का कहना है कि इन सूचियों में बदलाव करने या इनके भीतर नया वर्गीकरण बनाने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है। कोर्ट के आदेश से इसे लागू नहीं करवाया जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर नीति-निर्माण का विषय है।
'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत यहां क्यों लागू नहीं होता
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण दलील दी गई — "क्रीमी लेयर" की। यह वह सिद्धांत है जिसके तहत किसी आरक्षित श्रेणी में आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाता है। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत ऐतिहासिक रूप से सिर्फ OBC श्रेणी के लिए बनाया गया था — इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने इसे तय किया था। सरकार के अनुसार यह सिद्धांत कभी भी SC या ST पर लागू करने का इरादा नहीं था, क्योंकि इन दोनों समुदायों की पहचान जाति और सामाजिक भेदभाव पर आधारित है, न कि केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर।
इसके अलावा सरकार ने ई.वी. चिन्नैया मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति की सूची से किसी को हटाने का अधिकार भी सिर्फ संसद के पास है, कार्यपालिका (सरकार के प्रशासनिक अंग) या अदालत के आदेश से यह नहीं हो सकता।
पहले से मौजूद आर्थिक जांच व्यवस्था
सरकार ने यह भी बताया कि आरक्षण से जुड़ी कई कल्याणकारी योजनाओं में पहले से ही 'मीन्स टेस्ट' यानी आर्थिक स्थिति जांचने की प्रक्रिया मौजूद है — बस शिक्षा और सरकारी नौकरियों के आरक्षण में यह लागू नहीं होती। सरकार का कहना है कि अगर आरक्षण के भीतर भी आय-आधारित प्राथमिकता तय करनी है, तो पहले इसके लिए विस्तृत सामाजिक-आर्थिक शोध और डेटा जुटाना जरूरी होगा — यह काम अदालत के एक आदेश से नहीं हो सकता।
आगे क्या होगा
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि इस याचिका को खारिज किया जाए, क्योंकि उनके अनुसार यह कोई ठोस संवैधानिक अधिकार का सवाल नहीं उठाती, बल्कि परोक्ष रूप से अदालत से नीति बनवाने की कोशिश करती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है — क्योंकि इसका असर देश की पूरी आरक्षण व्यवस्था पर पड़ सकता है।
मामले की जानकारी: रामाशंकर प्रजापति व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य,
रिट याचिका संख्या 682/2025 (सुप्रीम कोर्ट)



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