सोशल मीडिया पर भ्रामक और सनसनीखेज खबरों पर नियंत्रण जरूरी

Author: Alok Kumar | Date: 2026-10-15 19:51:33

गोपालगंज- डिजिटल युग में यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म समाचार प्रसारण के प्रमुख माध्यम बन गए हैं। इनके जरिए सूचनाएं तेजी से आम लोगों तक पहुंचती हैं। हालांकि, अधिक व्यूज और सब्सक्राइबर पाने के उद्देश्य से कुछ चैनलों द्वारा भ्रामक शीर्षक, अपुष्ट जानकारी और सनसनीखेज सामग्री प्रसारित किए जाने की शिकायतें भी सामने आती हैं। इससे आम जनता में भ्रम, भय और आक्रोश की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसी सामग्री पर नियंत्रण के लिए तथ्य-जांच, समयबद्ध आधिकारिक सूचना और कानूनसम्मत कार्रवाई जरूरी है।

पुलिस प्रशासन के स्तर पर सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले वीडियो और खबरों की निगरानी के लिए व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इसके तहत जिले से संबंधित आपराधिक घटनाओं, कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक सद्भाव और पुलिस कार्रवाई को लेकर किए जाने वाले गंभीर दावों का सत्यापन किया जा सकता है। पुराने वीडियो को नई घटना बताकर प्रसारित करने, अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालने तथा संपादित वीडियो या फर्जी ऑडियो के जरिए गलत सूचना फैलाने जैसे मामलों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

हालांकि, प्रशासन की आलोचना करने वाले प्रत्येक वीडियो को भ्रामक नहीं माना जा सकता। निष्पक्ष आलोचना, जनहित में सवाल उठाना और वास्तविक अनियमितताओं को सामने लाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए किसी वीडियो के विरुद्ध कार्रवाई से पहले उसके वास्तविक लिंक, चैनल का नाम, प्रसारण की तारीख, संबंधित दावों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच आवश्यक है।

 कानूनी प्रावधानों के तहत होगी कार्रवाई

भ्रामक और आपत्तिजनक सामग्री के मामलों में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(2) के प्रावधानों को ध्यान में रखना जरूरी है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की संबंधित धाराओं तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के लागू प्रावधानों के तहत कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी धारा का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए, जब मामले के तथ्यों से संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया सामने आते हों।

ऑनलाइन सामग्री को अवरुद्ध करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत निर्धारित प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी के अधिकारों का पालन करना आवश्यक है। इसी तरह, मानहानि, निजता के उल्लंघन, पीड़ितों की पहचान उजागर करने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली सामग्री के मामलों में भी लागू कानूनों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

आधिकारिक खंडन और डिजिटल साक्ष्य पर जोर

भ्रामक खबरों का प्रभाव कम करने के लिए पुलिस विभाग की ओर से समय पर तथ्यात्मक प्रेस नोट, आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट या प्रेस ब्रीफिंग जारी की जा सकती है। इसमें घटना से जुड़े सत्यापित तथ्यों, वायरल वीडियो में किए गए दावों और वास्तविक स्थिति का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। साथ ही, आम लोगों से अपुष्ट सूचनाओं को साझा नहीं करने की अपील की जा सकती है।

यदि कोई वीडियो यूट्यूब की लागू नीतियों का उल्लंघन करता है, तो निर्धारित शिकायत व्यवस्था के माध्यम से कार्रवाई की मांग की जा सकती है। इसके लिए वीडियो का सटीक लिंक, संबंधित टाइमस्टैम्प, आपत्तिजनक सामग्री का विवरण और उपलब्ध प्रमाण प्रस्तुत करना उपयोगी होगा।

विधिसम्मत कार्रवाई के लिए डिजिटल साक्ष्यों का संरक्षण भी महत्वपूर्ण है। वीडियो का यूआरएल, चैनल की पहचान, प्रकाशन की तारीख और समय, स्क्रीनशॉट तथा अन्य संबंधित सामग्री को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रामाणिकता की जांच करते हुए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के लागू प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए।

पत्रकारों के साथ समन्वय भी जरूरी

जिला स्तर पर स्थानीय पत्रकारों, डिजिटल मीडिया संचालकों और पुलिस प्रशासन के बीच नियमित संवाद स्थापित किया जा सकता है। ऐसी बैठकों में समाचारों के तथ्यात्मक सत्यापन, पुराने वीडियो के गलत इस्तेमाल, पीड़ितों की पहचान सुरक्षित रखने और जांच से संबंधित अपुष्ट सूचनाओं के प्रसारण से बचने पर चर्चा की जा सकती है। इसका उद्देश्य स्वतंत्र पत्रकारिता पर नियंत्रण लगाना नहीं, बल्कि जिम्मेदार समाचार प्रसारण को बढ़ावा देना होना चाहिए।

प्रभावी व्यवस्था के लिए सोशल मीडिया मॉनिटरिंग रजिस्टर, त्वरित तथ्य-जांच प्रणाली और कानूनी समीक्षा की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। किसी वीडियो को हटवाने, अवरुद्ध करने या प्राथमिकी दर्ज करने से पहले मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रक्रिया की समीक्षा आवश्यक है।

पुलिस प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है कि भ्रामक सूचनाओं और जानबूझकर किए जाने वाले दुष्प्रचार पर त्वरित प्रतिक्रिया दी जाए, लेकिन वैध पत्रकारिता और लोकतांत्रिक आलोचना बाधित न हो। किसी भी कार्रवाई का आधार समाचार की भाषा या प्रशासन के प्रति उसका रुख नहीं, बल्कि सत्यापित तथ्य, संभावित प्रभाव और स्पष्ट कानूनी आधार होना चाहिए।