केस का नाम: Kunal Rameshbhai Kalyani Versus State of Gujarat & Anr.
उद्धरण (Citation): 2026 INSC 987 (2026 LiveLaw (SC) 925)
पीठ (Bench): न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
दिनांक: 7 सितंबर 2026
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मामला सरल भाषा में समझिए (Facts)
अपीलकर्ता (आरोपी) और शिकायतकर्ता महिला की मुलाकात एक digital/online platform पर हुई थी। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती एक प्रेम संबंध में बदल गई। पहली बार व्यक्तिगत रूप से मिलने पर आरोपी ने विवाह करने की इच्छा जाहिर की। इसी आधार पर, फरवरी 2024 में दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने, और अप्रैल 2024 में वे एक होटल में दो दिन साथ भी रहे। बाद में आरोपी ने यह कहते हुए शादी करने से इनकार कर दिया कि उसकी माँ इस रिश्ते के लिए राजी नहीं हैं।
इस पर शिकायतकर्ता ने वडोदरा, गुजरात के सयाजीगंज थाने में दिनांक 20.05.2025 को FIR दर्ज कराई (FIR No. 11196030250292), जिसमें आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। आरोपी ने इस FIR को रद्द करवाने के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया, परंतु राहत न मिलने पर मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।
धारा 69 BNS क्या कहती है? (सरल व्याख्या)
भारतीय न्याय संहिता, 2023 में यह एक नया प्रावधान है, जो पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) में सीधे तौर पर मौजूद नहीं था। धारा 69 का मूल पाठ इस प्रकार है:
"जो कोई, प्रवंचनापूर्ण (deceitful) साधनों का प्रयोग करके, अथवा किसी स्त्री से विवाह करने का वचन बिना उसे पूरा करने के किसी आशय के देकर, उसके साथ मैथुन करता है, और ऐसा मैथुन बलात्संग (rape) की कोटि में नहीं आता, तो वह दस वर्ष तक के कारावास से, जिसे जुर्माने से भी दंडित किया जा सकेगा।"
स्पष्टीकरण: इसमें "प्रवंचनापूर्ण साधनों" में शामिल है - झूठी पहचान बताना, नौकरी/पदोन्नति का झूठा वादा करना, या पहचान छुपाकर विवाह करने का वादा करना।
सरल शब्दों में कहें तो — यह धारा तभी लागू होती है जब आरोपी ने शुरू से ही बिना विवाह करने की कोई नीयत रखे, सिर्फ शारीरिक संबंध बनाने के इरादे से झूठा वादा किया हो। अगर वादा असली/सद्भावी (genuine) था और बाद में किसी परिस्थिति (जैसे परिवार की असहमति) के कारण पूरा नहीं हो सका, तो यह धारा 69 के दायरे में नहीं आता। यह धारा संज्ञेय (cognizable) और गैर-जमानती (non-bailable) अपराध है, यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है, परंतु जमानत अधिकार के रूप में नहीं मिलती।
कानूनी प्रश्न (Legal Issue)
क्या विवाह करने से इनकार करना — विशेषकर जब यह इनकार परिवार (माँ) की असहमति के कारण हो — धारा 69 BNS के तहत "छलपूर्ण मैथुन" (deceitful sexual intercourse) का अपराध बनता है?
निर्णय (Held)
सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द (quash) कर दिया। न्यायालय ने पाया कि इस मामले में किसी प्रकार के छलपूर्ण आचरण (deceptive conduct) का कोई प्रमाण नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया:
- संबंध आपसी सहमति से बना था: शिकायत की कहानी खुद ही यह दर्शाती है कि यह रिश्ता आपसी सहमति व प्रेम से बना था, छल से नहीं।
- छलपूर्ण नीयत का कोई प्रमाण जरूरी है: केवल इसलिए कि आरोपी ने बाद में माँ की असहमति के कारण शादी से इनकार किया, यह साबित नहीं होता कि शुरू से ही उसकी नीयत धोखा देने की थी।
- मुख्य सिद्धांत: "आरंभिक नीयत ही महत्वपूर्ण है — सद्भावना से किया गया वादा अगर बाद में पूरा न हो सके, तो वह जरूरी नहीं कि प्रवंचनापूर्ण (fraudulent) हो।"
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा (अनुवादित): "शिकायत में किए गए कथन स्पष्ट रूप से एक सहमति-आधारित संबंध को दर्शाते हैं, और हमें इसमें कोई छलपूर्ण आचरण नहीं मिलता।" तथा आगे कहा कि "वादा पूरी सद्भावना के साथ किया गया था, अगर किया भी गया था।"
न्यायालय का तर्क — धारा 69 BNS बनाम पुरानी IPC व्यवस्था
- पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375/376 के तहत, "विवाह के झूठे वादे पर सहमति" वाले मामलों को धारा 90 (सहमति की वैधता) के जरिए बलात्संग (rape) के दायरे में लाकर देखा जाता था — यानी यह साबित करना पड़ता था कि सहमति ही झूठे वादे के आधार पर प्राप्त की गई थी, और तब मामला रेप के तहत चलता था।
- संसद ने BNS की धारा 69 बनाकर, ऐसे "छलपूर्ण मैथुन" के मामलों को बलात्संग की गंभीर श्रेणी से अलग करके एक स्वतंत्र, हल्के दंड वाला अपराध बना दिया है — जिसमें स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया कि निषिद्ध कृत्य है "बिना पूरा करने के किसी इरादे के विवाह का वादा करना"।
- न्यायालय ने जोर देकर कहा कि धारा 69 के तहत मुकदमा चलाने के लिए यह दिखाना अनिवार्य है कि आरोपी ने शुरुआत से ही विवाह करने का कोई इरादा नहीं रखा था। पारिवारिक विरोध सहित अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण टूटा हुआ वादा, इस मापदंड को पूरा नहीं करता।
- मुख्य उद्धरण: "यह पर्याप्त रूप से सिद्ध होना चाहिए कि आरोपी की शुरू से ही पीड़िता से विवाह करने की कोई नीयत नहीं थी — इसे उन सद्भावी प्रतिबद्धताओं से अलग करते हुए जो परिस्थितियों के कारण, आरोपी के नियंत्रण से बाहर, पूरी नहीं हो सकीं।"
पुलिस/विवेचकों के लिए व्यावहारिक महत्व
- धारा 69 BNS के तहत FIR दर्ज करते/विवेचना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि केवल विवाह से इनकार होना ही पर्याप्त नहीं — विवेचना में यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी की प्रारंभ से ही विवाह न करने की नीयत थी (जैसे पहले से शादीशुदा होना छुपाना, झूठी पहचान बताना, आदि)।
- अगर तथ्यों से यह साफ झलकता हो कि संबंध शुरू से सहमति और वास्तविक भावनाओं पर आधारित था, और वादा बाद में पारिवारिक/सामाजिक कारणों से टूटा, तो ऐसे मामलों में धारा 69 के बजाय यह सिविल प्रकृति का विवाद हो सकता है, आपराधिक नहीं।
- विवेचक को चार्जशीट लगाने से पूर्व साक्ष्यों में स्पष्ट रूप से "आरंभिक छलपूर्ण नीयत" के तत्व की जांच करनी चाहिए, अन्यथा उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय में FIR रद्द होने की संभावना बनी रहती है, जैसा इस मामले में हुआ।
संबंधित कानूनी प्रावधान पूरे विस्तार से यहाँ पढ़ें: धारा 69 BNS - प्रवंचनापूर्ण साधनों का प्रयोग करके मैथुन (पूरा प्रावधान)



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