केस का नाम: Pramod Kumar & Ors. Versus State of U.P. & Ors.
उद्धरण (Citation): 2026 INSC 120
पीठ (Bench): न्यायमूर्ति राजेश बिंदल एवं न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई
दिनांक: 4 फरवरी 2026
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मामले की पृष्ठभूमि (Facts)
यह मामला फिरोजाबाद जिले के महिला थाना, सदर में दर्ज एक FIR से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 376D, 352, 504 एवं 506 के तहत अपराध पंजीकृत किया गया था। विवेचना के दौरान पुलिस को साक्ष्यों में गंभीर कमी नजर आई, जिसके आधार पर मई 2014 में अंतिम रिपोर्ट (फाइनल रिपोर्ट/क्लोजर रिपोर्ट) संबंधित न्यायालय में प्रस्तुत की गई। सितंबर 2015 में मजिस्ट्रेट ने बिना किसी आपत्ति के इस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, और मामला वहीं समाप्त हो गया।
इसके वर्षों बाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष हुई कार्यवाही के परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश सरकार ने CB-CID को इस प्रकरण की पुनः जांच का निर्देश दिया। CB-CID के इंस्पेक्टर ने विधिवत रूप से अप्रैल 2021 में सक्षम न्यायालय से आगे की जांच (Further Investigation) की अनुमति हेतु आवेदन प्रस्तुत किया। किंतु इसी बीच, संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) ने स्वयं अपने स्तर से 26 अप्रैल 2021 को आगे की जांच के निर्देश जारी कर दिए और बिना न्यायालय की औपचारिक अनुमति प्राप्त किए ही अभियुक्तों के DNA नमूने एकत्र करवा लिए।
इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए मामला उच्च न्यायालय होते हुए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।
कानूनी प्रश्न (Legal Issue)
क्या अनुसंधानकर्ता /पुलिस अधिकारी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) (तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के समतुल्य प्रावधान) के अंतर्गत, सक्षम मजिस्ट्रेट/न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना, स्वयं के स्तर पर आगे की जांच (Further Investigation) आरंभ कर सकते हैं?
निर्णय (Held)
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुलिस अधिकारी बिना मजिस्ट्रेट/न्यायालय की स्पष्ट अनुमति प्राप्त किए आगे की जांच नहीं कर सकते। न्यायालय ने पाया कि संबंधित पुलिस अधीक्षक ने "कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया की पूर्ण रूप से अवहेलना करते हुए" कार्य किया और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर स्वतंत्र रूप से जांच के आदेश जारी किए, जो पूर्णतः अवैध एवं प्रक्रिया-विरुद्ध है।
न्यायालय का तर्क (Reasoning)
- धारा 173(8) CrPC आगे की जांच की अनुमति तो देती है, परंतु इसे प्राधिकृत करने की शक्ति विशेष रूप से न्यायिक प्राधिकारी (Magistrate/Court) के पास निहित है, न कि कार्यपालिका अर्थात पुलिस अधिकारियों के पास।
- जांच एजेंसी को आगे की जांच हेतु सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष विधिवत आवेदन प्रस्तुत करना अनिवार्य है। मजिस्ट्रेट, मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों का परीक्षण करते हुए अपने न्यायिक विवेक (Judicial Discretion) का प्रयोग करके ही आगे की जांच की अनुमति दे सकते हैं या अस्वीकार कर सकते हैं।
- एक बार मजिस्ट्रेट द्वारा क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर लिए जाने के बाद, पुलिस प्रशासन अपने स्तर पर एकतरफा रूप से जांच पुनः आरंभ कर, न्यायालय के आदेश को दरकिनार नहीं कर सकता। ऐसा करना न्यायिक प्राधिकार को कमजोर करता है और शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) के सिद्धांत के विरुद्ध है।
पुलिस/विवेचकों के लिए व्यावहारिक महत्व
- किसी भी मामले में क्लोजर/फाइनल रिपोर्ट स्वीकार हो जाने के बाद, नए साक्ष्य या तथ्य प्रकाश में आने पर भी, आगे की जांच शुरू करने से पहले संबंधित मजिस्ट्रेट/न्यायालय से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है।
- यह अनिवार्यता किसी भी स्तर के अधिकारी — यहाँ तक कि पुलिस अधीक्षक (SP) स्तर के आदेश पर भी — समान रूप से लागू होती है।
- बिना अनुमति के की गई जांच कार्यवाही (जैसे DNA नमूना संग्रहण, गवाहों के पुनः बयान आदि) को न्यायालय अवैध/प्रक्रिया-विरुद्ध घोषित कर सकता है, जिसका सीधा असर मामले की साक्ष्य-वैधता (admissibility of evidence) तथा अभियोजन पर पड़ सकता है।
- वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को चाहिए कि पुनः जांच से संबंधित किसी भी सरकारी/प्रशासनिक निर्देश को क्रियान्वित करने से पूर्व, विवेचक के माध्यम से न्यायालय से औपचारिक अनुमति अवश्य प्राप्त करवाएं।
यह जजमेंट पुलिस विवेचना प्रक्रिया में न्यायिक निगरानी (Judicial Oversight) के महत्व को पुनः रेखांकित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि जांच एजेंसियां न्यायालय की अनुमति के बिना एकतरफा कार्रवाई कर उसके प्राधिकार को कमजोर न करें।



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