logo

यदि प्रश्न वाद या कार्यवाही से सुसंगत किसी बात से संबंधित हो, तो धारा 137 के उपबन्ध उस पर लागू होंगे।
असुसंगत परन्तु शील पर आघात करने वाले प्रश्न के मामले में, न्यायालय लांछन की गंभीरता, प्रासंगिकता और अननुपात जैसे कारकों को देखते हुए तय करेगा कि साक्षी को उत्तर देना अनिवार्य है या नहीं।
धारा 151 में निर्दिष्ट प्रकार का प्रश्न तभी पूछा जाना चाहिए जब पूछने वाले के पास यह मानने का युक्तियुक्त आधार हो कि उसमें निहित लांछन सुआधारित है।
यदि न्यायालय को लगे कि किसी अधिवक्ता ने बिना युक्तियुक्त आधार के ऐसा प्रश्न पूछा, तो वह मामले की परिस्थितियों की रिपोर्ट उच्च न्यायालय या संबंधित प्राधिकारी को कर सकता है।
न्यायालय अशिष्ट या कलंकात्मक प्रश्नों/पूछताछों का निषेध कर सकता है, सिवाय जब वे विवाद्यक तथ्यों या उनके अस्तित्व अवधारित करने हेतु आवश्यक विषयों से संबंधित हों।
न्यायालय ऐसे प्रश्न का निषेध करेगा जो अपमानित या क्षुब्ध करने के आशय से पूछा गया प्रतीत हो, या जो स्वयं में उचित होते हुए भी अनावश्यक रूप से आघातकारी रूप में हो।
केवल शील पर आघात कर विश्वसनीयता परखने वाले प्रश्न के उत्तर का खण्डन करने हेतु साक्ष्य नहीं दिया जा सकता, सिवाय पूर्व दोषसिद्धि से इंकार या निष्पक्षता संबंधी सुझाए तथ्यों के प्रत्याख्यान के।
न्यायालय अपने विवेकानुसार साक्षी को बुलाने वाले पक्षकार को वैसे प्रश्न पूछने की अनुज्ञा दे सकता है जैसे प्रतिपरीक्षा में पूछे जा सकते हैं, फिर भी वह उस साक्ष्य पर अवलंब लेने का हक नहीं खोता।
साक्षी की विश्वसनीयता पर उसकी अविश्वसनीयता की गवाही, रिश्वत/भ्रष्ट उत्प्रेरणा साबित करने या असंगत पूर्व कथन साबित करने द्वारा अधिक्षेप किया जा सकता है।
जिस साक्षी की सम्पुष्टि करनी हो, उससे उस सुसंगत तथ्य के आसपास देखी गई अन्य परिस्थितियों के बारे में भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं, यदि वे साबित होने पर उसके साक्ष्य को सम्पुष्ट करें।