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अधिवक्ता को क्लाइंट की स्पष्ट सम्मति के बिना क्लाइंट की संसूचना, दस्तावेज या दी गई सलाह प्रकट करने की अनुज्ञा नहीं है, सिवाय अवैध प्रयोजन या अपराध/कपट दर्शाने वाले तथ्यों के।
वाद के पक्षकार द्वारा स्वयं साक्ष्य दे देने मात्र से धारा 132 के प्रकटन-विशेषाधिकार का अत्यजन नहीं माना जाएगा; अधिवक्ता को साक्षी बुलाने पर भी केवल विशिष्ट प्रश्नों पर ही सम्मति मानी जाएगी।
किसी व्यक्ति को अपने और विधि सलाहकार के बीच हुई गोपनीय संसूचना प्रकट करने हेतु विवश नहीं किया जा सकता, सिवाय जब वह स्वयं साक्षी बने और अपने साक्ष्य को स्पष्ट करना आवश्यक हो।
वाद का पक्षकार न होने वाला साक्षी अपने हक विलेख, गिरवी/बन्धक संबंधी दस्तावेज या अपराध में फंसाने वाली दस्तावेज पेश करने हेतु विवश नहीं है, बिना लिखित करार के।
यदि कोई अन्य व्यक्ति किसी दस्तावेज/इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख को पेश करने से इंकार का हकदार होता, तो उसके कब्जे में न होने पर भी वर्तमान धारक उसे पेश करने हेतु विवश नहीं है, बिना उस व्यक्ति की सम्मति के।
साक्षी को यह कहकर प्रश्न का उत्तर देने से नहीं बचाया जा सकता कि उत्तर से वह अपराध में फंसेगा; परन्तु ऐसा विवश उत्तर उसके विरुद्ध गिरफ्तारी/अभियोजन का आधार नहीं बनेगा (मिथ्या साक्ष्य के सिवाय)।
सहअपराधी अभियुक्त के विरुद्ध सक्षम साक्षी होता है, और सहअपराधी के सम्पुष्ट परिसाक्ष्य के आधार पर की गई दोषसिद्धि अवैध नहीं मानी जाएगी।
किसी तथ्य को साबित करने के लिए किसी भी मामले में साक्षियों की कोई विशिष्ट संख्या अपेक्षित नहीं होगी।