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जो कोई न्यायालय से किसी विधिक अधिकार/दायित्व के बारे में निर्णय चाहता है जो उसके अभिकथित तथ्यों पर निर्भर है, उसे उन तथ्यों का अस्तित्व साबित करना होगा।
किसी वाद या कार्यवाही में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो असफल हो जाएगा यदि किसी भी ओर से कोई साक्ष्य न दिया जाए।
किसी विशिष्ट तथ्य के सबूत का भार उस व्यक्ति पर है जो न्यायालय से उसके अस्तित्व में विश्वास करने को कहता है, जब तक विधि द्वारा अन्यथा उपबन्धित न हो।
किसी अन्य तथ्य का साक्ष्य देने में समर्थ होने के लिए आवश्यक तथ्य को साबित करने का भार, साक्ष्य देने के इच्छुक व्यक्ति पर होता है।
अभियुक्त को अपने मामले का भा.न्या.सं. के साधारण अपवाद या किसी विशेष अपवाद/परन्तुक के अंतर्गत आना साबित करने का भार स्वयं वहन करना होगा; न्यायालय ऐसी परिस्थितियों का अभाव उपधारित करेगा।
जब कोई तथ्य विशेषतः किसी व्यक्ति को ज्ञात हो, तब उस तथ्य को साबित करने का भार उसी व्यक्ति पर होता है।
यदि यह दर्शित हो कि कोई व्यक्ति तीस वर्ष के भीतर जीवित था, तो उसकी मृत्यु साबित करने का भार यह प्रतिज्ञात करने वाले व्यक्ति पर होता है।
यदि किसी व्यक्ति के बारे में सात वर्ष से उन लोगों ने कुछ न सुना हो जो स्वाभाविक रूप से सुनते, तो उसके जीवित होने को साबित करने का भार प्रतिज्ञात करने वाले पर होता है।
यदि व्यक्ति भागीदार, भूस्वामी-अभिधारी या मालिक-अभिकर्ता के रूप में कार्य करते रहे हों, तो इस संबंध के न होने या समाप्त होने को साबित करने का भार प्रतिज्ञात करने वाले पर है।