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दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु या तो प्राथमिक साक्ष्य द्वारा या द्वितीयक साक्ष्य द्वारा साबित की जा सकती है।
प्राथमिक साक्ष्य का अर्थ है न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गई दस्तावेज स्वयं; मूल प्रतियां, प्रतिलेख और कुछ इलैक्ट्रॉनिक अभिलेखों को भी यह दर्जा प्राप्त है।
प्रमाणित प्रतियां, यांत्रिक प्रक्रिया से बनी प्रतियां, प्रतिलेख, मौखिक/लिखित स्वीकृतियां आदि द्वितीयक साक्ष्य में सम्मिलित हैं।
आगे वर्णित अवस्थाओं को छोड़कर, दस्तावेजें प्राथमिक साक्ष्य द्वारा ही साबित की जानी होंगी।
मूल दस्तावेज के प्रतिपक्षी के कब्जे में होने, नष्ट/खो जाने, स्थानांतरित न हो सकने, लोक दस्तावेज होने आदि दशाओं में द्वितीयक साक्ष्य दिया जा सकता है।
इलैक्ट्रॉनिक या डिजिटल अभिलेख की ग्राह्यता को केवल इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि वह इलैक्ट्रॉनिक/डिजिटल है; उसे अन्य दस्तावेज जैसा ही विधिक प्रभाव प्राप्त है।
इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख की अन्तर्वस्तु धारा 63 के उपबन्धों के अनुसार साबित की जा सकेगी।
निर्दिष्ट शर्तें पूरी होने पर कंप्यूटर/संचार-युक्ति से उत्पादित इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख (कंप्यूटर निर्गम) दस्तावेज माना जाएगा और प्रमाणपत्र सहित ग्राह्य होगा।
धारा 60(क) की दस्तावेजों का द्वितीयक साक्ष्य तभी दिया जा सकता है जब कब्जाधारी पक्षकार को पेश करने की सूचना पहले दी गई हो, कतिपय अपवाद-दशाओं के सिवाय।
यदि कोई दस्तावेज किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित या पूर्णतः/भागतः लिखित अभिकथित हो, तो उतने भाग का हस्ताक्षर या हस्तलेख उस व्यक्ति का होना साबित करना होगा।